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सरासर नाजायज?
Outlook Hindi
|July 21, 2025
क्या अमेरिका का ईरान के एटमी ठिकानों पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत जायज था? इज्राएल का आत्मरक्षा की आशंका में ईरान पर हमले पर क्या कहते हैं अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदे
यह महज अजीब ही नहीं है कि अमेरिका ईरान के उन्हीं एटमी ठिकानों पर बमबारी कर आया, जिसकी निगरानी के लिए संयुक्त व्यापक कार्य-योजना (जेसीपीओए) करार से 2018 में वह एकतरफा बाहर निकल गया था। उसे दुनिया भर के ज्यादातर विशेषज्ञों और राजनयिकों ने कानूनी और कूटनीतिक तौर पर नाजायज बताया है। ईरान तब जेसीपीओए की शर्तों का पालन कर रहा था, लेकिन अचानक पहले कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रंप ने उस करार को तोड़ दिया। फिर, ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों को नए सिरे लागू किया और उसके खिलाफ "भारी दबाव" बनाना शुरू किया।
क्या अब यह भी अजीब नहीं है कि अमेरिका एक तरफ बमबारी करता है और दूसरी ओर कूटनीतिक बातचीत की मांग कर रहा है। ट्रंप ने नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान 26 जून को पत्रकारों से कहा, "अगले हफ्ते ईरान से बात होनी है।"
यह सिर्फ अनैतिक या संतुलित रवैये से इनकार करना भर नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन भी है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) और 51 के तहत आत्मरक्षा या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से इजाजत के बिना सैन्य कार्रवाई पर रोक है। अनुच्छेद 2(4) अंतरराष्ट्रीय कानून का बुनियादी सिद्धांत है, जिसमें किसी भी देश के भौगोलिक इलाके या उसकी राजनैतिक स्वतंत्रता के खिलाफ सैन्य कार्रवाई या उसकी धमकी देने पर प्रतिबंध है।
अनुच्छेद 51 के मुताबिक, किसी भी देश के खिलाफ आत्मरक्षा की कार्रवाई की शर्त यह है कि पहले "हथियारबंद हमला" हुआ हो। ईरान के मामले में इन दोनों ही शर्तों का सरासर उल्लंघन हुआ है, क्योंकि पहले इज्राएल और बाद में अमेरिका ने हमला किया, जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई की।
Diese Geschichte stammt aus der July 21, 2025-Ausgabe von Outlook Hindi.
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