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वादी बोली दहशतगर्दी से तौबा

Outlook Hindi

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May 26, 2025

पहलगाम में आतंकी करतूत से समूचे देश के साथ सिहर उठे कश्मीर के लोग सड़कों पर उतर आए, 35 वर्षों में पहली बार कश्मीरी अवाम और हर रंग-पांत के नेता एक आवाज में बोल उठे, यह इंसानियत और कश्मीरियत पर हमला

- हरिमोहन मिश्र और तौफीक रशीद

वादी बोली दहशतगर्दी से तौबा

दर्द हद से बढ़ जाए तो दवा बन जाता है... यह कहावत मानो वादी में साकार होती दिख रही है। पहलगाम की बैसरन वादी के जन्नत-सी शांति, सुकून और प्राकृतिक सौंदर्य की फिजा में पहली बार अचानक मंगलवार 22 अप्रैल की भरी दोपहरी निहत्थों का खून बहा, तो समूची कश्मीर घाटी जैसे दहल उठी। सब दूर लोग तौबा, तौबा कह उठे। दक्षिण से उत्तर, अनंतनाग से कुपवाड़ा, श्रीनगर से बडगाम तक हर जगह लोग सड़कों पर उतर आए। विरोध प्रदर्शन, कैंडल मार्च, इंसानियत के दुश्मनों को सबक सिखाने के नारे, हाथों में दहशतगर्दी से तौबा लिखी तख्तियां। स्कूल, दुकानें, कारोबारी इदारे बंद हो गए। सड़कों पर सन्नाटा पसर गया। हर जबान पर सबक सिखाने की मांग गूंज उठी।

अगली सुबह अखबारों के पहले पन्ने पर काला बॉर्डर था और संपादकीय तथा सुर्खियां में "जवाबदेही" की मांग। मस्जिदों से "इंसानियत के कत्ल" की आवाजें उठीं। अगले जुमा की नमाज से पहले श्रीनगर के हजरतबल की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में दो मिनट का मौन रखा गया। मीरवाइज उमर फारूक ने तकरीर में कहा, "यह दहशतगर्दी है, मासूमों का, इंसानियत का कत्ल है, इसका कोई औचित्य नहीं ठहराया जा सकता।" लगभग हर रंग-पांत की राजनैतिक पार्टी, संगठन, समूह के नेता ने निंदा की। 28 अप्रैल को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया और सर्वसम्मति से मृतकों के सम्मान और दहशतगर्दी के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया।

अस्सी के दशक के आखिर (ठीक-ठीक 1988 या 1987 के चुनावों में भारी धांधली की शिकायतों के बाद) और नब्बे के दशक से आतंकवाद और खासकर पाकिस्तान की शह पर अलगाववाद के दौर के तकरीबन 35 वर्षों में पहली बार घाटी में किसी आतंकी वारदात के खिलाफ एक स्वर में खुलकर ऐसी नाराजगी का इजहार देखा गया। इस तरह वादी के अवाम ने समूचे देश को संदेश दिया कि "यह गम हमारा साझा है, हमसे इन दहशतगर्दों का कोई वास्ता नहीं," और सीमा पार पड़ोसी को भी कि "हमारे नाम पर यह खून बहाना बंद करो, हम तुम्हारे नहीं।" अतिथि-सत्कार के लिए जाने जाने वाले कश्मीरी लोगों के लिए यह कत्लेआम भयावह था। आखिर बड़ी संख्या में वहां लोगों की रोजी-रोटी और राज्य की अर्थव्यवस्था भी सैलानियों-सैर-सपाटा के लिए आने वाले लोगों की आमद पर निर्भर रहती है। लेकिन इस कत्लेआम से कहीं कोई नस इससे ज्यादा भी धधक उठी है।

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