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रेल दुर्घटनाओं से उपजते सवालों के जवाब आखिर कौन देगा?

Open Eye News

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July 2024

लीजिए, एक और ट्रेन दुर्घटना हो गई। यह घटना उत्तरप्रदेश के गोंडा जिले में घटित हुई, इसलिए इसे गोंडा ट्रेन दुर्घटना के नाम से जाना गया।

- कमलेश पांडे

रेल दुर्घटनाओं से उपजते सवालों के जवाब आखिर कौन देगा?

देखा जाए तो पिछले एक महीने में यह दूसरा बड़ा रेल हादसा है, जिसमें 3-4 यात्रियों की मौत हो चुकी है और आधा दर्जन से अधिक लोग घायल चुके हैं। इससे एक सुलगता हुआ सवाल पैदा हो रहा है कि लाखों लोगों के लिए यात्रा का प्राथमिक साधन रेलवे अब उतना सुरक्षित नहीं रह गया है, जितनी कि उससे अपेक्षा हुआ करती है। आंकड़े बताते हैं कि भारत के रेलवे नेटवर्क में, 64,000 किलोमीटर (40,000 मील) ट्रैक पर 14,000 ट्रेनों में प्रतिदिन 12 मिलियन से अधिक यात्री यात्रा करते हैं। बावजूद इसके यहां रेल दुर्घटनाओं का एक लंबा इतिहास रहा है। गत जून महीने में ही पश्चिम बंगाल में एक मालगाड़ी एक यात्री ट्रेन से टकरा गई, जिसमें नौ लोगों की मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हो गए, क्योंकि मालगाड़ी के चालक ने सिग्नल की अनदेखी की थी। इसी तरह से पिछले साल, पूर्वी भारत में एक बड़ी ट्रेन दुर्घटना हुई, जिसमें 280 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी, जो दशकों में सबसे घातक दुर्घटनाओं में से एक थी। आलम यह है कि रेल सुरक्षा में सुधार . के तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद, हर साल कई एक दुर्घटनाएँ होती हैं, जिनका कारण अक्सर मानवीय भूल या पुराने सिग्नलिंग उपकरण होते हैं। लेकिन लगातार हो रही इन रेल दुर्घटनाओं को देखते हुए आधा दर्जन से अधिक महत्वपूर्ण सवाल पैदा हो रहे हैं, जिनके जवाब समय रहते ही मिल जाएं तो इन दुर्घटनाओं को टाला जा सकेगा। पहला, रेलवे की कवच सुरक्षा प्रणाली अब तक केवल 1 प्रतिशत रेलवे ट्रैक को ही क्यों कवर कर पाई है ? इस विलम्ब के लिए कौन जिम्मेदार है? दूसरा, अगर देश के पास सभी रेलवे ट्रैक पर कवच प्रणाली लगाने के साधन नहीं हैं, तो प्रधानमंत्री और रेलमंत्री कवच प्रणाली को अपग्रेड करने के बजाय बुलेट ट्रेनों और 250 किलोमीटर प्रति घंटे की हाई स्पीड ट्रेनों की संख्या बढ़ाने के पीछे क्यों पड़े हैं? क्या उनके ऊपर कोई कूटनीतिक

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