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तराई से गायब होती तरावट

India Today Hindi

|

August 13, 2025

कभी नदियों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों के कारण जल संपन्नता का प्रतीक माने जाने वाले हिमालय की तराई का इलाका बीते दो-तीन साल से भीषण जल संकट का सामना कर रहा

- पुष्यमित्र

तराई से गायब होती तरावट

सीतामढ़ी जिले के बिशनपुरी गोनाही गांव की प्रियंका, नीतेश और संजीत तथा श्रीरामपुर गांव के हरिशंकर, मिंटू और चंद्रकांत के पास आजकल एक ही काम है. वे रोज दिन में करीब दस बजे फोन लेकर बैठ जाते हैं, फिर दो से तीन घंटे अपने जिलाधिकारी और बिहार सरकार की नल-जल योजना से जुड़े विभिन्न अधिकारियों को फोन लगाते रहते हैं. जिनसे बात हो गई, उन अधिकारियों से वे अपने इलाके में जलापूर्ति व्यवस्था को ठीक कराने का अनुरोध करते हैं.

प्रियंका बताती हैं, "हमारे गांव में सात-आठ साल पहले नल-जल योजना की शुरुआत हुई थी. टंकी लगी, पाइप लाइन बिछाई गई. तब लोगों को लगता था, इस योजना का क्या लाभ ? घर-घर में हैंडपंप लगा था, 60-70 फुट की गहराई पर खूब पानी मिलता था. बारिश भी अच्छी होती थी. बाढ़ का इलाका है तो वाटर लेवल भी ठीक रहता है. मगर दो-तीन साल से गड़बड़ियां शुरू होने लगीं, पिछले साल हैंडपंप का लेयर गिरने लगा. इस साल तो गांव के 80 फीसद से ज्यादा हैंडपंप सूख गए. ऐसे में सबको नल-जल योजना की याद आई. फिर पता चला कि पड़े-पड़े सारा सिस्टम खराब हो गया है, अब हम इसको ठीक कराने में लगे हैं." उनकी मां हैंडपंप चलाकर दिखाती हैं, और करीब सौ बार चलाने पर एक बाल्टी पानी भरता है. उनकी चाची राजकली देवी के घर में दो-दो हैंडपंप हैं, और दोनों सूखे पड़े हैं.

उनके ही गांव के संजीत, जिनकी मां वार्ड सदस्य हैं, कहते हैं, "नल-जल योजना के सिस्टम को हम लोगों ने चेक कराया तो पता चला कि किसी का स्टार्टर खराब है तो किसी का स्टैबिलाइजर. कहीं मोटर जला हुआ है तो कहीं सड़क निर्माण कार्य के कारण पाइप लाइनें फट गई हैं. मेरे वार्ड में ज्यादातर लोगों के नलों की टोटियां ही गायब हो गई थीं." इन लोगों ने मिलकर पहले वार्ड तीन की व्यवस्था को ठीक कराया, फिर दूसरे वार्ड की व्यवस्था को ठीक कराने में जुटे हैं.

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