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पहली उड़नपरी पी टी उषा

Anokhi

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January 03, 2026

दौड़ने का शौक तो अमूमन हर बच्चे को होता है, पर 1980 के दशक में अपने इस शौक को अंतरराष्ट्रीय करिअर में तब्दील करने का माद्दा बड़ी बात है। पी टी उषा ने संसाधनों के अभाव में यह सब कर दिखाया और फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह की परंपरा में नई जान फूंक दी। जीवटता और प्रतिबद्धता से भरपूर उनकी जिंदगी की कहानी साझा कर रहे हैं

- न्यूज एडिटर गौरव त्यागी

पहली उड़नपरी पी टी उषा

संघर्षों के पथरीले पथ से सफलता के शिखर तक पहुंचीं पी टी उषा भारतीय खेलों में अनुशासन और अडिग जिद का जीवंत प्रमाण हैं।

केरल के पैय्योली कस्बे में सीमित संसाधनों के बीच पली इस साधारण लड़की ने हर मोड़ पर खुद को और मजबूत किया। उनके लिए दौड़ महज खेल नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की वजह थी। एशियाई मंच पर भारत का परचम लहराते हुए उषा ने दिखाया कि प्रतिबद्धता और अनुशासन से किसी भी कमी को पीछे छोड़ा जा सकता है। उनका सफर भारतीय एथलेटिक्स की वह प्रेरक कथा है, जिसमें कठिनाइयां और उपलब्धियां एक ही रेखा पर दौड़ती हैं।

साधारण घर की असाधारण प्रतिभा

पिलवुल्लकण्डी ठेकेपराम्बिल उषा यानी पी टी उषा। इन्हें भारतीय खेल की 'गोल्डन गर्ल' और 'पैय्योली एक्सप्रेस' भी कहा जाता है। केरल के कई हिस्सों में मौजूद परंपरा के अनुसार ही उनके नाम के पहले उनके परिवार/घर का नाम है। 1980 और 1990 के दशक में वह भारतीय ट्रैक एंड फील्ड की सबसे बड़ी हस्तियों में रही हैं। उषा का जन्म 27 जून, 1964 को कोझिकोड जिले के पैय्योली के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। गांव की जिंदगी, सीमित संसाधन और साधारण स्कूलिंग के बीच उन्होंने बचपन में ही दौड़ को अपना बना लिया। कोझिकोड के उनके प्राथमिक स्कूल के कोच बालकृष्णन ने पहली बार उनकी प्रतिभा पहचानी। उन्होंने चौथी में पढ़ने वाली उषा की दौड़ सातवीं की चैंपियन धाविका के साथ करवाई और उषा ने उसे भी हरा दिया।

मनाही के बीच मंजिल का आगाज

उषा पढ़ाई में अच्छी थीं, इसलिए उनके माता-पिता खासकर उनकी मां टी वी लक्ष्मी, जो एक शिक्षक थीं- उन्हें खेलों में नहीं भेजना चाहते थे। पिता ईपीएम पैतल छोटे व्यापारी थे। उस समय लड़कियों के खेल में भाग लेने या शॉर्ट्स पहनने को लेकर समाज में कई तरह की धारणाएं थीं। परिवार चाहता था कि उषा पढ़-लिखकर शिक्षक बनें, लेकिन उनके चाचा टी वी नारायणन और कुछ अन्य लोगों ने उन्हें खेल जारी रखने के लिए मनाया। 1977 में 13 साल की उम्र में वह कन्नूर में राज्य सरकार के महिला खेल विभाग में दाखिल हो गईं। यही वह समय था, जब कोच ओ. एम. नाम्बियार की नजर उन पर पड़ी। वह वहां एथलेटिक्स कोच थे और एक पुरस्कार वितरण समारोह में वह उषा से पहली बार मिले।

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