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ध्यान के जगत में ओशो का योगदान

Sadhana Path

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December 2022

ध्यान के जगत में ओशो का जो योगदान है, वह अपने आप में विशिष्ट है, क्योंकि ओशो से पूर्व ध्यान व ध्यानी की जो भी पारंपरिक परिभाषा व छवि थी ओशो ने उसमें कायाकल्प किया। ओशो ने ध्यान को नीरसता से हटाकर उत्सव के साथ जोड़ा तथा उसे व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि दी । आत्मरूपांतरण में ओशो की ध्यान विधियां अपने आप में मिसाल हैं, पर कैसे आइए जानते हैं।

- शशिकांत 'सदैव'

ध्यान के जगत में ओशो का योगदान

पूर्ण चिकित्सा पद्धति है - स्वामी अंतर जगदीश

मनुष्य की पीड़ा और भूल का मनोविश्लेषण कर ओशो ने ध्यान की एक अनूठी व्यवस्था को जन्म दिया। जो न सिर्फ आधुनिक मनुष्य की मनोपृष्ठभूमि पर आधारित है, बल्कि इस तरह से संयोजित है कि, किन्हीं आतंरिक कारणों से बच्चे, जवान और वृद्धों सभी को भाती है। कारण इसका गैर-गंभीर तत्त्व है, उत्सव है और प्राकृतिक नियमों पर आधारित होना है। और इस व्यवस्था को जमाते हुए उन्होंने बड़ी सूक्ष्मता से मन की से चालों और अपेक्षाओं को उकेरा इसलिए ध्यान विधियों के अतिरिक्त उन्होंने समूह चिकित्सा पद्धतियों की रचना की जिनके माध्यम से हम मन की जकड़ से छूट कर, उसकी अचेतन प्रणाली को भेदकर, अपना विकास कर सकें। यह आज के मनुष्य के लिए आध्यात्मिक विकास का मूलाधार है अन्यथा वर्षों का श्रम भी अंत में 'कोल्हू का बैल साबित' होता है।

उनके प्रवचनों को सुनना भी एक तरह की चिकित्सीय पद्धति से गुजरना है, जहां मन के अनेक घाव उनकी वाणी के जादुई प्रभाव से स्वतः ही भर जाते हैं। चूंकि मौलिक रूप से ये घाव हमारे भावों, विचारों, स्मृतियों आदि से भोजन पाते हैं और ओशो अपने प्रवचनों में इन सब बिमारियों को उघाड़ते हैं, जड़ से मिटाते हैं। उनकी वाणी का मखमली प्रभाव और प्रवचनों का मूल स्वरूप इस चिकित्सा को जन्म देता है।

इसके अतिरिक्त ओशो ने अनेक ग्रुप थैरेपीज की रचना की जैसेमिस्टिक रोज ग्रुप, नो माइंड, बॉर्न अगेन, हू इज इन आदि। ये तीन दिन से लेकर 21 दिन तक के बहुत सशक्त समूह कोर्स हैं जहां साधक को अपने भावों, विचारों, अचेतन जड़ता आदि में उतरने का अवसर प्राप्त होता है । वह स्वयं ही इस सारी यात्रा में गुजरते हुए, अपने मूल स्वरूप के निकट आता है और ध्यान की गहराइयों में भी डूबता है। अनेक एनकाउंटर थेरेपीज को भी ओशो ने साधकों पर आजमाया और व्यक्तिगत रूप से हजारों लोगों को उस व्यवस्था में भी दिशा दी । इस तरह से सिर्फ ध्यान की विधियों की रचना न कर उन्होंने ग्रुप थेरेपीज को साधकों के लिए निर्मित किया जो बहुत महत्त्वपूर्ण है और जरूरी भी है।

वैसे तो ओशो द्वारा सृजित ध्यान व्यवस्था का फलक बहुत बड़ा है और वर्गों में बंटता नहीं तब भी व्याख्या के लिए मौलिक रूप से तीन वर्गों में उन्हें रखा जा सकता है।

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ओशो शब्दों के सम्राट हैं

पहली बात तो ओशो एक विचारक हैं, महान विचारक। जो किसी धर्म से नहीं विचारों से जुड़ा रहा। विचारों से जुड़ने का मतलब है सत्य से जुड़ना। जो सत्य से जुड़ता है सब उसके दुश्मन हो जाते हैं, यही कारण था कि ओशो के इतने दुश्मन पैदा हुए। ओशो के साथ बस एक दिक्कत रही कि 99 प्रतिशत वह लोग उनके खिलाफ रहे जिन्होंने उन्हें न कभी सुना है, न ही कभी पढ़ा है।

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मेरी दृष्टि में ओशो अपने समय के सबसे ज्यादा बौद्धिक क्षमता से युक्त व्यक्ति थे जिनमें ज्ञान और विज्ञान को अपने तर्कों के माध्यम से प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता थी। आप उनसे सहमत हो या न हो वो अलग बात है। मेरी नजर में उन जैसा कोई दूसरा व्यक्ति नहीं है।

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काल की शिला पर अमिट हस्ताक्षर हैं ओशो

जब हम किसी भी व्यक्तित्व के बारे में सोचते हैं तो विचारों में सबसे पहले उसकी आकृति उभरती है। ऐसे ही ओशो के बारे में सोचते ही एक चित्र उभरता है, ओशो की घनी दाढ़ी, उन्नत भाल, समुद्र सी गहराई और बाज-सी तीक्ष्ण दृष्टि वाला उनका व्यक्तित्व एक ऐसा आभा मंडल रचता है, कि हम जैसे लोग जिन्होंने उन्हें सिर्फ फोटो में देखा है, उन्हें पढ़ने या सुनने के लिए विवश हो जाते हैं। ओशो की आवाज, वाणी, उनके शब्द, भाषा शैली, अभिव्यक्ति एवं वक्तव्य की बात करूं तो वह अद्वितीय है।

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नया साल अपने साथ खुशियां और सौहार्द लेकर आता है। ऐसे में पूरे वर्ष को और भी ज्यादा खास बनाने के लिए वास्तु संबंधित कुछ उपाय अपनाए जा सकते हैं। इससे घर की परेशानियां दूर होने के साथ आर्थिक तंगी से भी छुटकारा मिलेगा।

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ओशो से मेरा परिचय धर्मयुग के कारण हुआ उसमें उनके लेख, साक्षात्कार छपते थे। और मेरे कॉर्टून जिसमें मेरा डब्बू जी के नाम से एक कॉलम आता था, जिसे ओशो बहुत पसंद करते थे, यहां तक कि वह अपने प्रवचनों के बीच संन्यासियों को हंसाने के लिए उस पत्रिका को हाथ में लेते और कहते 'देखते हैं इस हफ्ते डब्बू जी क्या कहते हैं' और सबको उसमें से कोई लतीफा सुनाते थे। मैंने ओशो को खूब पढ़ा है। मैं उनके प्रवचनों से बहुत प्रभावित रहा हूं।

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