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आप राष्ट्र के भावी कर्णधार या अभिभावक हैं तो...
Rishi Prasad Hindi
|March 2025
किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिए जितनी आवश्यकता शिक्षित नागरिकों की मानी जाती है उससे भी कहीं ज्यादा नैतिकता से सुसम्पन्न चरित्रवान नागरिकों की होती है और बिना आध्यात्मिकता के नैतिकता टिक ही नहीं सकती।
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अतः राष्ट्र की सच्ची प्रगति का मूल है आध्यात्मिकता। आज लौकिक शिक्षा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च होते हैं परंतु विद्यार्थियों के नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक संस्कारों के प्रति अरुचि देखने को मिलती है। इनके अभाव में निस्तेज, अशांत, असंतुष्ट, तनावग्रस्त व अपराधों में लिप्त प्रजा का निर्माण होता है। उसी प्रजा में से राष्ट्र के शासक और अधिकारी बनते हैं जो राष्ट्र के शीघ्र अधःपतन का कारण बन जाते हैं। प्रायः लोग भ्रष्टाचारी शासकों के बारे में फरियाद करते हैं पर मूल समस्या पर गौर नहीं कर पाते।
स्वामी प्रणवानंदजी कहते हैं कि "विद्यार्थी-जीवन का प्रथम और प्रधान कर्तव्य ही चरित्र-गठन करना है। लिखाई-पढ़ाई के साथ नैतिक चरित्र का गठन होना भी जरूरी है, नहीं तो कुछ भी नहीं किया जा सकता।"प्राचीन भारत में सुसंस्कार-सिंचन शिक्षा का मूल था और यह कार्य गुरुकुल शिक्षा व संतों-महापुरुषों का सत्संग-लाभ लेनेवाले बड़े-बुजुर्गों द्वारा किया जाता था। तभी देश को ऐसे नागरिक मिलते थे जिनका जीवन ईश्वर-परायणता, सच्चरित्रता, परोपकार आदि गुणों से सुवासित रहता था।
Denne historie er fra March 2025-udgaven af Rishi Prasad Hindi.
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