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अपने जन्म-कर्म को दिव्य कैसे बनायें?
Rishi Prasad Hindi
|April 2024
२९ अप्रैल को पूज्य संत श्री आशारामजी बापू का अवतरण दिवस है । आप सभीको इस दिन की खूब - खूब बधाई ! इस पावन पर्व पर जानते हैं जन्म-कर्म को दिव्य बनाने का रहस्य पूज्य बापूजी के सत्संग-वचनामृत से:
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मन में दुःखीपने का ॐ भाव आया उस समय दुःख का जन्म हुआ। सुखीपने का भाव आया तो सुख का जन्म हुआ । 'मैं बालक हूँ' भाव आया तो बालकपने का जन्म हुआ। 'मैं वृद्ध हूँ' भाव आया तो वृद्धत्व का जन्म हुआ परंतु मैं तो इन सबको जाननेवाला हूँ।
असंगो हायं पुरुषः... सब परिस्थितियों से असंग, ज्ञानस्वरूप, प्रकाशमात्र, चैतन्यस्वरूप, आनंदस्वरूप हूँ...' इस प्रकार भगवान अपने स्वतःस्फुरित, स्वतःसिद्ध स्वभाव को जानते हैं। ऐसे ही आप भी अपने स्वतःसिद्ध स्वभाव को जान लें तो आपका जन्म और कर्म दिव्य हो जायेंगे।
शरीर को मैं मानना और शरीर की अवस्था को मेरी मानना यह जन्म है। हाथ-पैर, इन्द्रियों से कर्म होता है, उसमें कर्तृत्व मानना कर्म है । 'कर रहे हैं हाथ-पैर और मैं इनको सत्ता देनेवाला चैतन्य हूँ' - इस प्रकार यदि जान लिया तो कर्म और जन्म दिव्य हो जाते हैं।
Denne historie er fra April 2024-udgaven af Rishi Prasad Hindi.
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