कट्टरवाद का केयरटेकर फेसबुक
Sarita|September Second 2020
कट्टरवाद का केयरटेकर फेसबुक
भारत में मुख्यधारा का मीडिया अपनी विश्वसनीयता खो चुका है. मीडिया के कई संस्थान सत्ता के साथ सांठगांठ कर उस के हित के लिए देश में धार्मिक कट्टरता व नफरत फैलाने में लिप्त हैं. वे असल मुद्दों पर ज्यादा फोकस नहीं कर रहे. विकल्प के तौर पर फेसबुक और व्हाट्सऐप आमजन की अभिव्यक्ति के सरल माध्यम बने थे. लेकिन, क्या ये सच में आमजन की अभिव्यक्ति के सच्चे साधन बन पाए? अलगअलग हो रहे खुलासों से तो ऐसा लग रहा है कि फेसबुक कट्टरवाद का केयरटेकर सा बन गया है.
नसीम अंसारी कोचर

मार्क जकरबर्ग बड़े कारोबारी है र्क जुकरबर्ग बड़े कारोबारी हैं और कारोबारी के लिए पैसा कमाना सब से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. पैसे से दुनिया संचालित होती है. पैसे के आगे सियासत भी नतमस्तक है. पैसे के आगे इंसानी जान, जनभावनाएं, नैतिकता, लोककल्याण जैसी बातें बेहद तुच्छ मालूम पड़ती हैं. व्यवसाय जितना बड़ा होता जाता है, पैसे की इच्छा उतनी ही विशाल होती जाती है.

फेसबुक और व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया मंच चलाने वाले बड़े कारोबारी मार्क जुकरबर्ग की धनलालसा भी उन के कारोबार की तरह बहुत बड़ा आकार ग्रहण कर चुकी है और कारोबार भी रोचक है. यह कारोबार भावनाएं भुनाने का, भावनाएं भड़काने का, भावनाएं उकसाने का, भावनाएं परोसने का, भावनाएं शेयर करने का है. भावनाओं पर टिके उन के इस कारोबार ने कहीं सत्ता छीनी, कहीं सत्ता बनाई, कहीं सत्ता की साजिशों को पंख दिए तो कहीं सत्ताधारियों की आवाजों को बुलंद किया.

आज जुकरबर्ग की कंपनी फेसबुक अपनेआप में एक बड़ी ताकत बन चुकी है. वह ईसाइयों के पोप, हिंदुओं के भागवत, मुसलामानों के खलीफा जैसी हो गई है, जो तय कर रही है कि आम आदमी क्या सोचे, क्या देखे, क्या पढ़े, क्या जाने और क्या माने.

फेसबुक धर्मप्रचार का बड़ा माध्यम बना हुआ है. वहीं, वह सत्ता के साथ गहरी सांठगांठ के चलते सत्तासीनों के मानवताविरोधी उग्र भाषणों व बयानों को भी खूब स्पेस देता है. तब उस के सामने उस नियम का पालन करने की बाध्यता नहीं होती, जिस के तहत मानवता को नुकसान पहुंचाने वाली बातों को तुरंत हटाने का जिक्र है.

वह हिंसक वीडियो सर्कुलेट होने देता है, भड़काऊ भाषणों को ज्यादा से ज्यादा दूर तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाता है, किसी धर्म विशेष को नीचा दिखाने वाले पोस्ट साझा करता है तो किसी धर्म विशेष को बड़ा बनाने की मुहिम में लिप्त नजर आता है. यही नहीं, फेसबुक अंधविश्वास, टोनेटोटके, काला जादूमंतर, धार्मिक प्रवचनों, अनुष्ठानों, अवैज्ञानिक बातों का बड़ा प्लेटफौर्म बन चुका है जहां मूल् की टोलियां दिनरात अपनी मूर्खताओं के प्रसारप्रचार में जुटी हुई है.

गौरतलब है कि यूजर्स की तादाद के हिसाब से भारत फेसबुक का सब से बड़ा बाजार है. देश की 25 फीसदी आबादी तक इस की पहुंच है.

वर्ष 2023 तक यह 31 फीसदी लोगों तक पहुंच सकता है, व्हाट्सऐप की पहुंच तो और ज्यादा है. अपने असीम नफे को देखते हुए जुकरबर्ग ने नैतिकता को ताक पर रख कर दक्षिणपंथियों के आगे हथियार डाल दिए हैं कि वे फेसबुक और व्हाट्सऐप का मनमरजी से इस्तेमाल कर सकते हैं.

इस प्लेटफौर्म के जरिए वे लोगों की भावनाएं भड़का सकते हैं. एक संदेश के जरिए सड़क पर लोगों का मजमा लगा सकते हैं. गोहत्या की अफवाह फैला कर किसी निर्दोष को घेर कर मार सकते हैं. कहीं भी दंगे करवा सकते हैं. गोलियां चलवा सकते हैं. समुदाय विशेष के खिलाफ घृणा फैला सकते हैं. वोटरों को लुभा सकते हैं. अपने हक में मतदान का फैसला मोड़ सकते हैं. किसी को गरिया सकते हैं. किसी को देशद्रोही बता सकते हैं. जुकरबर्ग ने अपने फेसबुक प्लेटफौर्म पर दक्षिणपंथियों, सत्ताधारियों को ये तमाम हरकतें करने की खुली छूट दे रखी है.

सत्ता से फेसबुक की सांठगांठ में दोनों के पौबारह हैं. अगर नुकसान में कोई है तो वह है आम नागरिक, जो भावनाओं के इस खेल में उलझ कर अपनी जान व माल का नुकसान उठा रहा है. कहीं वह सड़कों पर पीटा जा रहा है तो कहीं नरसंहार में मारा जा रहा है. कहीं वह तबलीगी, आतंकी, घुसपैठिया करार दिया जा रहा है तो कहीं घृणा और उपेक्षा का पात्र बन रहा है.

भारत में से पत्रकार, बहुत लेखक, फिल्म कलाकार ऐसे हैं जिन्हें या जिन के परिवार की महिलाओं को भी बलात्कार की धमकी दी जाती है. सरकार कड़े आईटी कानून होने की बात कहती है, बावजूद इस के, ऐसे लोगों के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई करती नहीं दिखती है.

हाल ही में अमेरिकी अखबार द वाल स्ट्रीट जर्नल ने मार्क जुकरबर्ग की सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक के बारे में प्रमाण सहित यह बात लिखी है, "फेसबुक और सरकार के बीच में कोई आपसी समझदारी है और इसीलिए जो पोस्ट सरकार की राजनीति से मेल खाती हैं उन्हें सैंसर नहीं किया जाता, भले ही उन से घृणा और हिंसा फैलती हो.

अखबार ने लिखा है, "यह भयानक स्थिति है, क्योंकि फेसबुक केवल एक पार्टी और विचारधारा के लिए एक हथियार के रूप में ही इस्तेमाल नहीं हो रहा, बल्कि इस से दंगों और नरसंहार का वातावरण भी बन रहा है."

परोस रहा है धार्मिक कट्टरवाद का जहर

मौजूदा वक्त में हिंदुओं का मुसलमानों के प्रति और मुसलमानों का हिंदुओं के प्रति जो रवैया है, कहना गलत नहीं है कि अब दोनों ही समुदायों की एकदूसरे के प्रति नफरत चरम पर है और इस नफरत को फैलाने में सोशल मीडिया की भूमिका सब से अहम है, खासकर, फेसबुक और व्हाट्सऐप की.

देश में कहीं दंगा हो न हो मगर फेसबुक पर रोज दंगा होता है. सुबह होते ही एक धड़ा दूसरे पर हमला बोल देता है. ऐसे में दूसरा भी खामोश नहीं रहता, पलटवार करता है. मांबहन की गालियों के साथ जहरीली बोलियों से पन्ना क्षणभर में रंग जाता है. क्षणभर में दोनों ओर समर्थकों की फौज आ जुटती है. घमासान शुरू हो जाता है. इन में हिंदू कौन है और मुसलमान कौन, यह ज्यादा दिमाग लगाने वाली चीज नहीं है.

आज के हालात पर यह कहना गलत नहीं है कि फेसबुक ने नफरत के उन परिंदों को पंख दिए हैं जिन के जीवन का एक ही उद्देश्य है दूसरे समुदाय को अपशब्द कहना, जलील करना, उकसाना, नफरत फैलाना और फिर दंगे करवाना. एक वक्त था जब लोग दिलों में कुंठा लिए थे, मगर इस बात से डरते थे कि अगर अपने दिल में बसी उस नफरत को वे लोगों के सामने ले आए तो समाज क्या कहेगा. लेकिन सोशल मीडिया ने अब ऐसे लोगों को निडर बना दिया है.

ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सऐप... सोशल मीडिया के इन प्लेटफोर्स पर कुंठित दिमाग वाले जहर पका रहे हैं, जहर परोस रहे हैं और जहर ही खा रहे हैं. और इस जहर के खाने से इस जहरीले समुदाय की तादाद कम होने के बजाय बढ़ ही रही है. हर सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर इन्हें अपने जैसे लोग बड़ी तादाद में मिल जाते हैं और इन का कारवां हुजूम बनता जा रहा है. ये उन लोगों को फौलो कर रहे हैं, जो इन से मिलतीजुलती बात करते हैं. नतीजा यह होता है कि यदि विचारों में कुंठा शामिल है, तो वह कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है.

फेसबुक पर फैलते जहर से उपजते हैं शंभू रैगर जैसे दानव, जो हत्या के बाद लाश के सामने खड़े हो कर वीभत्स वीडियो बनाते हैं और फिर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं. उन के इस दुस्साहस को आसानी से समझा जा सकता है कि कुछ लोग उस वीडियो में शंभू की दलील पर सहमति जताते हैं. याद रहे, जो युद्ध आज फेसबुक पर छिड़ा है, कल सड़कों पर होगा और तब जो लाशों के ढेर लगेंगे उस पर कफन ओढ़ाने का काम फेसबुक नहीं कर पाएगा. इसलिए इस माध्यम को इस की औकात में रखना जरूरी है.

शातिर फेसबुक और नादान पब्लिक

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