हमारी वर्जिनिटी हमारे लिए नहीं तो बचाएं क्यों?
Sarita|September Second 2020
हमारी वर्जिनिटी हमारे लिए नहीं तो बचाएं क्यों?
पुरुषवर्ग लड़कियों से वर्जिन रहने की अपेक्षा करता है जबकि वही उन की वर्जिनिटी पर हमला करने से बाज नहीं आता. वहीं, स्त्रीवर्ग में अब यह सोच उभरने लगी है कि जब वर्जिनिटी उस की हो कर भी उस के लिए नहीं, तो वह उसे बचाए क्यों...
पद्मा अग्रवाल

हमारे शास्त्रों और सामाजिक व्यवस्था ने वर्जिनिटी को विशेषरूप से महिलाओं के चरित्र के साथ जोड़ कर उन के लिए अच्छे चरित्र का मानदंड निर्धारित कर दिया है. जबकि, समाज में वर्जिनिटी की परिभाषा इस के बिलकुल उलट ही है.

दरअसल, समाज और शास्त्रों के अनुसार इस का अर्थ है कि आप प्योर यानी शुद्ध हैं. यहां किसी चीज की प्योरिटी की बात नहीं की जा रही है बल्कि लड़की की प्योरिटी की बात की जा रही है. लड़की की वर्जिनिटी को ही उस की शुद्धता की पहचान बना दी गई है. लड़कों की वर्जिनिटी की कहीं भी कोई बात नहीं करता.

आज भी कई जगह वर्जिनिटी टैस्ट के लिए सुहागरात के दिन सफेद चादर बिछाई जाती है. वर्ष 2016 में महाराष्ट्र के अहमदनगर में खाप पंचायत के जरिए लड़के द्वारा लड़की को वर्जिनिटी टैस्ट के लिए विवश किया गया. और जब लड़की इस में फेल हुई, तो दोनों को अलग करने के लिए साम, दाम, दंड, भेद सबकुछ आजमाया गया. परंतु लड़के ने हार नहीं मानी और कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां से उसे न्याय मिला.

समाज में न जाने इस तरह के कितने मामले पड़े हुए हैं जिन में लड़कियों का जीवन इसलिए नरक बन जाता है क्योंकि वह लड़की वर्जिन नहीं होती. यानी, इस से पहले उस ने किसी के साथ संबंध इच्छा या अनिच्छा से बनाया होगा. इसी वजह से उसे कैरेक्टरलैस और बदचलन मान लिया जाता है.

डा. ईशा कश्यप कहती हैं कि वर्जिनिटी को ले कर हमारा समाज बहुत छोटी सोच रखता है. इस के कारण आज भी लड़कियों की स्थिति दयनीय है. यहां तक कि कई बार तलाक तक हो जाते हैं और लड़की की आवाज को अनसुना कर दिया जाता है.

कल्याणपुर की नलिनी सिंह का कहना है कि आज भी अगर लड़की वर्जिन है तो शादी के बाद उसे उस के पति और समाज की घटिया सोच का शिकार होना पड़ता है.

इंजीनियरिंग कालेज की छात्रा अखिला पुरवार ने कहा कि जब लड़कों की वर्जिनिटी कोई माने नहीं रखती तो फिर लड़कियों की वर्जिनिटी को ले कर इतना बवाल क्यों?

हम सब अपने को चाहे कितना मौडर्न कह लें, लेकिन अपनी सोच में बदलाव नहीं ला पा रहे हैं. यदि वर्जिनिटी पर सवाल उठाना ही है तो पहले लड़के की वर्जिनिटी पर सवाल उठाना होगा क्योंकि वह किसी भी समय किसी भी लड़की को शिकार बना कर उस की वर्जिनिटी को जबरदस्ती भंग कर देता है. लेकिन जब शादी का सवाल आता है तो वह ऐसी किसी लड़की को अपना जीवनसाथी बनाने के पहले उस के चरित्र पर बदचलन का दाग लगाने में एक पल भी नहीं लगाता.

हिंदू धर्म में परस्पर विरोधी बातें कही गई हैं. एक ओर तो कुंआरी कन्या को देवी मानते हुए कंजिका पूजन की प्रथा का आज भी प्रचलन है, सामान्यतया सभी परिवारों में नवरात्र में छोटी कन्या को भोजन और भेंट देने का रिवाज है, दूसरी ओर सभी शास्त्र, पुराण, रामायण, महाभारत एकस्वर में कहते हैं कि स्त्री आजादी के योग्य नहीं है, यानी, वह स्वतंत्रता के लिए अपात्र है.

मनुस्मृति में तो स्पष्ट कहा

'पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षित यौवने

रक्षतिस्थविरेपुत्रा न स्त्री स्वातंत्रमहेति.'

(मनुस्मृति 9-3)

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