सपा-बसपा-कांग्रेस ब्राह्मण वोटबैंक के बहकावे में
Sarita|September First 2020
सपा-बसपा-कांग्रेस ब्राह्मण वोटबैंक के बहकावे में
भाजपा द्वारा अयोध्या में राम की मूर्ति लगाने के बीच समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में परशुराम की सब से ऊंची मूर्ति लगाने की बात क्या की कि बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस भी ब्राह्मणों को लुभाने पर उतर आईं. योगी सरकार को ब्राह्मणविरोधी बता ये पार्टियां ब्राह्मण वोटबैंक को तरहतरह से प्रभावित करने में लगी हैं.
शैलेंद्र सिंह

मंदिरों की मूर्तियों से शुरू हुई मूर्ति लगाने की पहल नेताओं के नाम पर मूर्ति और पार्क बनवाने से होते हुए ऊंचे से ऊंचे कद पर पहुंच गई. मनुवाद और मूर्तिपूजा का विरोध करने वाली बसपा ने सब से अधिक मूर्तियां लगवाने का काम किया. बसपा नेता मायावती में मूर्ति के प्रति इतनी आस्था है कि उन्होंने अपनी खुद की मूर्तियां भी लगवाईं. मूर्तियों के बहाने जातीय वोटबैंक निशाने पर होता है. नया निशाना राम की जगह परशुराम पर है और परशुराम के बहाने ब्राह्मण वोटबैंक पर.

अयोध्या में राममंदिर के भूमिपूजन के साथ भारतीय जनता पार्टी ने सोचा था कि 'राम के नाम' पर समाज में लोग एकजुट हो जाएंगे. यह उन का बड़ा वोटबैंक बन जाएगा. राममंदिर के लिए भूमिपूजन होते ही 'राम के नाम पर होने वाली राजनीति राम की जगह परशुराम की तरफ मुड़ कर ब्राह्मण वोटबैंक पर आ टिकी. समाजवादी पार्टी के नेता अभिषेक मिश्रा ने कहा कि सपा की सरकार बनने पर परशुराम की सब से ऊंची मूर्ति लगाई जाएगी. अभिषेक के कहने का मतलब यह था कि राम की मूर्ति से भी ऊंची परशुराम की मूर्ति उत्तर प्रदेश में लगाई जाएगी.

राममंदिर भूमिपूजन के बाद अचानक ब्राह्मण सब से बड़ा वोटबैंक बन कर खड़ा हो गया. हर दल उस के पीछेपीछे घूमने लगा. इस की वजह उत्तर प्रदेश में 12 फीसदी ब्राह्मण वोट हैं. माना जाता है कि उत्तर प्रदेश की विधानसभा की 206 सीटों पर ब्राह्मण मतदाता जीत की राह तय करते हैं. ब्राह्मण दावा कर रहे हैं कि वे कभी जातिवादी नहीं रहे. वे हमेशा समाज के कल्याण को प्रमुखता देते हैं. वे अपने लाभ की बात नहीं सोचते. ब्राह्मण अपने बारे में सोचता, तो चाणक्य चंद्रगुप्त को राजा बनाने की जगह खुद राजा बन जाता.

जो मुखर वही सफल

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