धुआं-धुआं दिल्ली

Gambhir Samachar|March 1, 2020

धुआं-धुआं दिल्ली
दिल्ली फिर धधकी. सीएए व एनआरसी जैसे मुद्दे पर दो धड़े भिड़े, खबर लिखे जाने तक 11 जाने गई। और 200 लोग घायल हुए, पुलिस वाले की भी जान गई. लेकिन ऐसे हालात दिल्ली में जब तब क्यों ? हो जाते हैं. विचारणीय है.

खबरियां चैनलों पर दिल्ली में भड़की हिंसा की रोंगटे खड़ी कर देती है. 22 से 25 फरवरी के बीच दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाके में हिंसा काफी विभत्स रूप ले चुकी थी. 11 लोगों की मौत हो चुकी थी और 200 से अधिक लोग घायल हो चुके थे. इस हिंसा में जान गंवा चुके दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतनलाल का अंतिम संस्कार हो चुका था. कई इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया था. लेकिन इन बलावइयों का जत्था टुकड़े-टुकड़े में दिल्ली के कई इलाके में सक्रिय होने लगे थे. हालांकि दिल्ली के अन्य इलाकों में इसे भड़कने नहीं दिया गया. लेकिन कुल मिला कर दिल्ली इतनी हिंसक क्यों हो गई? या इस हिंसा की टाइमिंग जानबूझ कर तय की गई? ये ऐसे सवाल है, जिनसे न केवल दिल्लीवासियों को बल्कि पूरे देश को सोचना चाहिए.

यह शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि जब देश में कोई वीआईपी विदेशी मेहमान दौरे पर आया हो वैसे समय में दिल्ली दंगाइयों की जद में हो. क्या वाकई किसी ने इस बात की फिक्र नहीं की कि केंद्र सरकार का तंत्र राष्ट्रपति ट्रंप के स्वागत की तैयारियों में लगा है तो दिल्ली शांत रहे. दंगे की नौबत न आए. या फिर दिल्ली के उत्तर-पूर्वी हिस्से में हिंसा इसलिए हुई या होने दिया गया ताकि जब तमाम खबरियां चैनलों के स्क्रीन ट्रंप के आगमन की तस्वीरों से भरे हुए हों, तब हिंसा का खेल खेला जाए. लेकिन इसके उलट हुआ यह कि इस हिंसा की खबर ने ट्रंप के कवरेज को काफी हद तक समेट दिया. क्या इस दंगे को लेकर सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों की इसकी भनक या अंदाजा नहीं था कि हालात इस कदर खराब हो सकते हैं.

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March 1, 2020