सरकार को ललकारते छात्र

Mukta|February 2020

सरकार को ललकारते छात्र
एक तरफ जहां प्रशासन व सरकार के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए हैं वहीं छात्र भी अपनी आवाज मुखर करने से पीछे नहीं हैं. जामिया, एएमयू और जेएनयू समेत देश के तमाम शैक्षणिक संस्थानों के छात्र बगावत कर रहे हैं, लाठी खा रहे हैं, लड़मर रहे हैं लेकिन फिर भी वे सरकार से दबने को तैयार नहीं.
सीमा ठाकुर

छात्रों द्वारा दिया यह आजादी का नारा आज देश के विभिन्न हिस्सों में गूंज रहा है. 2016 में जब जवाहरलाल ' नेहरू यूनिवर्सिटी से कन्हैया कुमार का यह ' नारा उठा था तब उसे देशद्रोही, आतंकवादी, नक्सली क्याक्या नहीं कहा गया. आज एक । बार फिर छात्र उसी दौर से गुजर रहे हैं जब सरकार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को देशद्रोह का नाम दे कर दबाने की कोशिश पुरजोर है. यह मोदी सरकार वह ' सरकार है जो छात्रों को कुचलने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है.

युवा नेता उमर खालिद ने एक ट्वीट में लिखा, '2 0 0 5 में जेएनयू में चल रहे एक प्रोटेस्ट के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को छात्रों ने उन की आर्थिक नीतियों के खिलाफ काले झंडे दिखाए थे. यह एक बड़ी खबर बन गई थी. ऐडमिन ने तुरंत छात्रों को नोटिस भेजा था. अगले ही दिन पीएमओ ने बीच में उतर कर ऐडमिन से छात्रों के खिलाफ किसी भी तरह का ऐक्शन लेने के लिए मना किया था क्योंकि विरोध करना छात्रों का लोकतांत्रिक अधिकार है.'' वहीं, दूसरी तरफ वर्तमान मोदी सरकार है जिस ने विद्रोह कर रहे छात्रों की बोलती बंद करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है.

देश की राजनीति में छात्र आंदोलन अत्यधिक महत्त्व रखते हैं. भारत में छात्र आंदोलनों या युवा विरोध प्रदर्शनों का विस्तृत इतिहास रहा है. आजादी से पहले देश की आजादी के लिए युवाओं ने विरोध प्रदर्शनों, आंदोलनों, रैलियों और सत्याग्रहों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. आजादी के बाद विद्यार्थियों द्वारा स्टूडेंट्स यूनियन का गठन हुआ जिस ने पहलेपहल विद्यार्थियों की आवाज को प्रशासन तक पहुंचाने का काम किया और बाद में देश की सरकारी नीतियों की आलोचना करना शुरू किया. प्रशासन और सरकार को हिला कर रख देने वाले छात्र आंदोलन लोकतंत्र का उदाहरण हैं. लेकिन आज इन्हें दबाने और छात्रों को विरोध करने से रोकने की प्रशासन की कोशिश बढ़ती जा रही है जो लोकतंत्र और देश के संविधान को नकारने से ज्यादा कुछ नहीं.

वर्तमान में नागरिकता संशोधन कानून, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर जैसे मुद्दों पर छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं. नागरिकता संशोधन कानून के मुताबिक भारत सरकार हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई व पारसी शरणार्थियों को तो भारतीय नागरिकता प्रदान करेगी लेकिन मुसलमान शरणार्थियों को नहीं. सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि हर धर्म के लोगों ने इस कानून को संविधान के विरुद्ध पाया और यही कारण है कि 12 दिसंबर से ही इस कानून के विरोध में छात्र सड़कों पर उतर आए.

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