शौक से मिली एक नई पहचान

Anokhi|May 9, 2020

शौक से मिली एक नई पहचान
हम सबमें कोई न कोई हुनर है, पर बहुत कम लोग ही उस हुनर को व्यावसायिक रूप दे पाते हैं। अभिलाषा जैन उन्हीं कम लोगों में से एक हैं। उनकी कहानी साझा कर रही हैं,
सुमन बाजपेयी

संयुक्त परिवारों की परंपरा कुछ ऐसी होती है कि सबकी पसंद का ध्यान रखने और बनाने वाले बहुत सारे हाथ होने के कारण रसोई से हर समय भिन्न- भिन्न व्यंजनों की खुशबू घर को महकाती ही रहती है। कुछ खास स्वाद और नए प्रयोग भी इन रसोइयों में खूब देखने को मिलते हैं। औरजब दादी, मां, चाची, कुछ पका रही हों तो बच्चे कहां रसोई में तांक-झांक करने से बाज आते हैं। और अगर खुद खाने का शौक हो तो खाना कैसे बनता है, इसे जानने की उत्सुकता की नींव बचपन में ही पड़ जाती है।

पीढ़ियों का ज्ञान

भीलवाड़ा में रहने वाले मारवाड़ी संयुक्त परिवार में रहने वाली और घर की पहली बेटी होने के कारण लाड़-प्यार में पली अभिलाषाजैन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बचपन में बनाई चपाती से मिली घरभरकी प्रशंसा उन्हें मारवाड़ी खाने की दुनिया में एक विशिष्ट पहचान दिलाएगा, उन्होंने तब कहां सोचा था। आज वह अपनी कई पीढ़ियों से मिले पारंपरिक मारवाड़ी व्यंजनों को तकनीक के माध्यम सेलोगों तक पहुंचाती हैं। उनके मारवाड़ी खाने की इसीलिए इतनी मांग रहती है, क्योंकि इस तरह का खाना आमतौर पर किसी रेस्तरां में नहीं मिलता है। फेसबुक पर उन्होंने एक पोस्ट डाली कि आज वह दाल- बाटी-चूरमा बना रही हैं, कोई चाहे तो ऑर्डर कर सकता है। एक ही दिन में उनके पास 40 ऑर्डर आ गए और उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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May 9, 2020