योग का वैज्ञानिक आधार
Sadhana Path|October 2020
योग का वैज्ञानिक आधार
योग को आज पूरे विश्व में मान्यता प्राप्त है । विज्ञान भी योग के चमत्कार को नमस्कार करता है ? अनुसंधानों से यह सिद्ध भी हो चुका है कि योग के द्वारा रोगोपचार संभव है योग के इस वैज्ञानिक विशेषण को आइए पढ़े लेख में।
योगाचार्य भारतभूषण

एक समय था कि जब योग विद्या के भ्रांतियां फैली हुई थीं और थोड़ी बहुत आज भी हैं। इसका कारण है योग विद्या के विज्ञान का सही-सही ज्ञान न होना। एक समय में कुछ लोग कांच के ऊपर चलना, आग पर चलना, हाथ से जंजीर तोड़ देना, खुद को जमीन के अंदर दबा लेना हाथ से राख भस्म व सोने की जंजीर, घड़ी आदि बातों को योग के चमत्कार का नाम देकर अंधविश्वास फैलाते थे और ऐसा माना जाता था कि यह योग विद्या केवल साधु संन्यासियों के लिये ही है। इस तरह योग के विषय में कई भ्रांतियां प्रचलित थीं।

पिछले कुछ एक दशक में विवेकानन्द, स्वामी कुवल्यानंद, स्वामी शिवानंद महर्षि योगी, आचार्य श्री रजनीश, गुरुकुल कागड़ी विश्वविद्यालय के योग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. ईश्वर भारद्वाज, मोरारजी देसाई योग संस्थान दिल्ली, बाबा रामदेव आदि के प्रयासों से योग विद्या का वैज्ञानिक स्वरूप लोगों के समक्ष प्रस्तुत हुआ तथा योगविद्या जन साधारण के लिये उपयोगी हो गयी।

योग विद्या के सही विज्ञान का अध्ययन इसलिए भी आवश्यक है कि कई लोगों के लिये योग का अर्थ कुछ आसनों तथा प्राणायाम तक ही सीमित है। सामान्यतः आज के युग को स्वास्थ्य व चिकित्सा और व्यायाम की पद्धति के रूप में समझा जाता है। अनुसंधानों से यह सिद्ध भी हो चुका है कि योग के द्वारा रोगोपचार संभव है परंतु योग के द्वारा शरीर को स्वस्थ व निरोगी रखना यह योग का मर्यादित उपयोग हो सकता है। योग का पूर्ण उद्देश्य नहीं हो सकता हां योग को एक पूरक चिकित्सा पद्धति के रूप में जीवन शैली का अंग बनाया जा सकता है, क्योंकि हर चिकित्सा पद्धति का अपना महत्त्व व उपयोग है। योग का पूर्ण उद्देश्य तो परमात्मा प्राप्ति व दुख मुक्ति ही है।

योग की वैज्ञानिक पद्धति

जन समूह व साधकों के बीच योग के भिन्न-भिन्न व कई प्रकार के मार्ग व विधियां प्रचलित हैं। जैसे ज्ञान योग, कर्म योग, संन्यास योग, हठयोग, मंत्र योग, तंत्र योग, कुण्डलिनी योग, भक्ति योग, आदि। तो यह विचारणीय है कि योग की वैज्ञानिक पद्धति कौन सी है। इस संबंध में योग की प्राचीन व प्रमाणिक पुस्तकें 'गोरक्षशतक' व "शिव संहिता' में योग के जिन प्रकारों का वर्णन मिलता है उन सभी में सबसे मुख्य 'राजयोग' है, क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के योग के संबंधित तथ्य कहे गये हैं। राजयोग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टांग योग का ही दूसरा नाम है। महर्षि पतंजलि को योग दर्शन का प्रवर्तक भी कहा जाता है। योग दर्शन का मूल ग्रंथ महर्षि पतंजलि द्वारा रचित 'पातंजल सूत्र' या 'योग सूत्र' है। अष्टांग योग दो शब्दों की संधि से बना है अष्ट+अंग अर्थात् ऐसा योग मार्ग जिसमें 8 अंग व चरण हों। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि ये योग के 8 चरण हैं, देखा जाये तो यह योग का सम्पूर्ण विज्ञान एक ही वाक्य में है। इन 8 अंगों का क्रमबद्ध व सूत्रबद्ध पालन ही योग का विज्ञान कहलाता है। ये आठ अंग परस्पर गहन संबध रखते हैं। इनके क्रम को परिवर्तित नहीं किया जा सकता। जैसे सामान्य जन योग के तीसरे व चौथे अंग का ही बहुतायत में पालन कर रहे हैं और प्रथम व द्वितीय अंग (यम तथा नियम) का पालन नहीं करते हैं। साथ ही अन्य अंगों का पालन भी नहीं करते हैं। इन 8 अंगों का क्रमबद्ध पालन ही योग को एक जीवन इकाई व परिपूर्ण बनाता है।

1.यम- यह योग का प्रथम अंग है यम आसक्तियों व कुप्रवृलत्तियों को नष्ट करने के लिए उपयुक्त है। मनुष्यों का अन्य प्राणियों के साथ व्यवहार कैसा है यह उसके चित्त की शुद्धता पर निर्भर करता है। इसलिए सबसे पहले इस व्यवहारिक जीवन को यमों के द्वारा शुद्ध व दिव्य बनाना होता है। योग में यमों की संख्या 5 है अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह। मनुष्य का मन चंचल है तथा क्षण-क्षण में बदलता रहता है। यम पालन का अर्थ है 'जीवन ऊर्जा को दिशा देना'। मनुष्य के पास ऊर्जा सीमित है। वृद्धावस्था आते-आते ऊर्जा कम होती चली जायेगी। योग विज्ञान यमों के पालन के द्वारा मनुष्य की ऊर्जा को इकट्ठा करके एक शुभ दिशा में प्रविष्ट कराना चाहता है।

2. नियम- योग का दूसरा अंग व चरण नियम है। सदाचार के पालन की दिशा में पांच प्रकार के नियम बताये गये हैंशौच, संतोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्राणिधान। नियमों का संबंध केवल अपने व्यक्तित्व व अन्तकरण के साथ होता है। इसके पालन से व्यक्ति में दिव्यता व शुद्धि और पवित्रता का जन्म होता है। नियम का अर्थ है 'ऐसा जीवन जो अव्यवस्थित न हो ऐसा जीवन जिसमें सुनिश्चित अनुशासन हो।

3. आसन- योग का तीसरा चरण है आसन आज समाज में योग के इस अंग से सभी परिचित हैं सामान्य जन शरीर की कुछ विशेष स्थिति व आकृति को आसन समझते हैं, जबकि पतंजलि ने किसी भी ऐसे आसन का वर्णन नहीं किया है जिनका प्रचलन आज सर्वविदित है। पतंजलि आसन को परिभाषित करते हुए कहते हैं 'स्थिरसुखमासनम' अर्थात् जो स्थिर व सुखदायी हो वह आसन है। शरीर की एक ऐसी स्थिति जिसमें स्थिर व सुखदायी ठहरा जा सके वह आसन कहलाती है। आसन का यह अनुभव वही ले सकता है जिसने योग के पहले दो अंग यम-नियम का पालन किया हो। जिसने संयम व नियमित्ता का जीवन जीया हो। शास्त्रों में आसनों के विषय में कहा गया है कि-

आसनों का अभ्यास एक वैज्ञानिक पद्धति है। प्रयोगों से आज यह बात सिद्ध हो चुकी है कि आसनों का शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

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