अपनाएं योग रहें निरोग
Sadhana Path|July 2020
अपनाएं योग रहें निरोग
यूं तो योग तथा आसनों को करने के अनेक लाभ हैं तथा प्रत्येक आसन हमें किसी न किसी प्रकार के रोग से मुक्ति अवश्य दिलवाता है तो आईए जानते हैं कि कौन सा आसन हमें किस रोग से मुक्त करता है तथा उसकी विधि व क्या लाभ हैं।
योग गुरु सुनील सिंह

यह सही है कि योग एक वैज्ञानिक पद्धति है परंतु इसका लाभ उठाने | के लिए हमें न केवल आसनों का ज्ञान होना चाहिए बल्कि उन्हें किस रोग में, कैसे, कितना व किन सावधानियों के साथ किया जाना चाहिए इस बात की भी जानकारी होनी चाहिए। उम्र, अवस्था एवं रोग अनुसार योग हमारे जीवन में मानसिक शांति के साथ-साथ शारीरिक सुख भी लाता है। हर योगासन का अपना ही विशेष महत्त्व व लाभ है जो इस प्रकार है

शशांक आसन

सशांक अर्थात् खरगोश इस आसन में बैठता है या सोता है इसलिए इसे शशांकासन कहते हैं। सबसे पहले जमीन पर वज्रासन की अवस्था में बैठ जाएं और फिर लंबी गहरी श्वास भरें और साथ-साथ दोनों हाथों को ऊपर उठाते हुए ऊपर की ओर तानें। ध्यान रहे हथेलियां खुली हुई और सामने की ओर होनी चाहिए । अब सांस को बाहर निकालते हुए कमर तक के भाग को नीचे मोड़ते हुए अपने दोनों हाथों की हथेलियों को जमीन पर टिकाएं। फिर माथे को जमीन पर टिकाएं, हमारे श्वास की गति झुके रहने पर सामान्य होगी। अपनी क्षमतानुसार और समयानुसार इस आसन में सकें और फिर धीरे-धीरे हाथों को ऊपर लाएं। यह इस आसन का एक चक्र हुआ। इस आसन को 5 बार अवश्य करें।

लाभइस आसन के अभ्यास से हमारा मन शान्त होता है। एकाग्रता, दृढ़ निश्चय, क्रोध पर नियन्त्रण, मानसिक सन्तुलन, बुद्धि का विकास और दृष्टिकोण सकारात्मक होता है। इससे दमा, हृदय रोग, फेफड़ा रोग और श्वास संबंधित विकार दूर होते हैं। यह आसन मेरुदण्ड के लिए बहुत ही लाभप्रद होता है। चेहरे पर लालिमा, कान्ति और तेज बढ़ता है, महिलाओं के लिए यह आसन विशेष रूप से लाभदायक होता है, शशांकासन हमारे शरीर के पूरे अंगों की थकान दूर करता है।

विशेष -स्लिप डिस्क, गर्भवती महिलाएं और गठिया के रोगी बिना योग गुरु से परामर्स लिए इस आसन का अभ्यास न करें।

गोमुखासन

इस आसन में हमारे शरीर की आकृति गाय के मुख समान हो जाती है। इसलिए हमारे योगियों ने इस आसन का नाम गोमुखासन रखा है।

विधि-जमीन पर बैठ जाएं। उसके बाद टांग को मोड़ते हुए एड़ी को नितम्ब के पास ले जाएं और दाएं नितम्ब की एड़ी पर टिकाकर बैठ जाएं। इसी प्रकार दाई यंग को मोड़कर एड़ी को बायें नितम्ब के पास लाएं। हमारे घुटनों की स्थिति ऐसी होनी चाहिए कि दोनों घुटने एक-दूसरे के ऊपर आ जाएं। अब बायें हाथ को पीछे से मोड़कर हथेली को बाहर की ओर रखते हुए ऊपर की ओर ले जाएं। दाहिने हाथ को ऊपर से मोड़ें और कोहनी सीधी करते हुए दोनों हाथों की उंगलियों को एक-दूसरे से पकड़ लें। थोड़ी देर इस स्थिति में रहें, ध्यान रहे कमर, गर्दन और सिर बिल्कुल सीधा होना चाहिए । नजर सामने की ओर होनी चाहिए तथा श्वास की गति सामान्य । कुछ देर बाद अपनी क्षमतानुसार रहने के बाद इसी प्रकार से दूसरी यंग को मोड़कर और हार्थों की स्थिति बदलकर इसका अभ्यास करें। इस आसन को दोनों ओर से कम से कम 3-3 बार अभ्यास करें।

लाभ-यह आसन दमा तथा क्षयरोगी के लिए रामबाप का काम करता है। इसके अभ्यास से धातु की दुर्बलता, मधुमेह, प्रमेह और बहुमूत्र आदि रोग दूर हो जाते हैं। जब हम इस आसन में एक तरफ का हाथ उठाते तो एक तरफ का फेफड़े का श्वास अवरुद्ध होता है और दूसरा फेफड़ा तीव्र वेग से चलता है जिससे हमारे फेफड़ों की सफाई तथा खत का संचार बढ़ जाता है। हमारे फेफड़ों के 1 करोड़ छिद्रों में रक्त का संचार भली-भांति होता है। यह आसन महिलाओं की मासिक धर्म से जुड़ी परेशानी और ल्यूकोरिया की शिकायत दूर करता है। यह महिलाओं के वक्ष स्थल को सुडौल बनाता है। छाती चौड़ी होती है। पीठ, गर्दन, बांह और टांगें मजबूत होती हैं।

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