योग एक मार्ग अनेक
Sadhana Path|July 2020
योग एक मार्ग अनेक
परमात्मा हो या परमशांति या फिर गणित का कोई भी छोटा सा सवाल। इन तक पहुंचने के या सवाल को हल करने के भले कई मार्ग व माध्यम होते हैं परंतु इनका उत्तर एक ही होता है ऐसे ही योग की भी विभिन्न शारवाएं हैं, विभिन्न आसन और अवस्थाएं हैं परंतु सबकी मंजिल,सबकि उपलब्धि एक ही है।
शशिकांत 'सदैव'


योग शब्द सुनते ही अधिकतर लोगों के मन-मस्तिष्क में शारीरिक आसन, प्राणायाम इत्यादि आ जाते हैं। लोग सोचते हैं योग यानी योगासन । योगासन योग का ही एक हिस्सा है पर यह योग को सही मायने में परिभाषित नहीं करता। योग का अर्थ है 'जोड़' किन्हीं दो चीजों का मिलन, सन्धि । सरीर के विभिन्न आसनों के माध्यम से जब हम प्रकृति से जुड़ते हैं या अपने भीतर के अस्तित्व को बाहर के अस्तित्व से जोड़ते हैं तो उसे तथाकथित 'योगासन' कहते हैं। पर जब योग परमात्मा को, परमशांति को, परम आनंद को, परम शक्ति को, परम सत्य व सत्ता को पाने के लिए किया जाता है तो इसका अर्थ और गहरा और भिन्न हो जाता है।

हर मनुष्य एक दूसरे से भिन्न है। सबका स्वभाव व प्रकृति भी अलग-अलग है। यही कारण है कि सबके विचार, मार्ग, उद्देश्य, सिद्धांत व मान्यताएं आदि भी भिन्न हैं। कोई अंतर्मुखी है तो कोई बहिर्मुखी, कोई आस्तिक है तो कोई नास्तिक, कोई व्यावहारिक है तो कोई , औपचारिक, किसी का दृष्टिकोण वैज्ञानिक है तो किसी का काल्पनिक, कोई आध्यात्मिक है, तो कोई सांसारिक, इतनी भिन्नता के कारण ही आज धरती पर अनेक धर्म, वाद, भाषाएं, मान्यताएं, संस्कृति व परमपराएं आदि हैं पर इतनी भिन्नता के बावजूद भी जो सब में एक चीज सामान्य है वह है सुख-शांति की खोज, सुकून और आनंद की तलाश । फर्क ये है कि आस्तिक आदमी के मार्ग भावनाओं एवं संवेदनाओं से होते हुए परमात्मा तक जाते हैं और नास्तिक आदमी के मार्ग तर्क एवं व्यावहारिकता से होते तथ्य तक पहुंचते हैं। पर दोनों ही परम तक पहुंचना चाहते हैं फिर वह परम आत्मा हो या परम शांति, परम शक्ति हो या परम अस्तित्व, परम चेतन्य हो या परम मुक्त । उस परम को पाना सभी चाहते हैं।

शायद यही कारण है कि मानव की विभिन्न प्रकृति को ध्यान में रखकर ही उस 'परम' तक पहुंचने के कई मार्ग निर्मित किए गए हैं, जिन्हें विभिन्न योगों से जाना जाता है। साधना के ये विभिन्न योग मानव को उस परम' तक पहुंचाने में पूरी तरह से मदद करते हैं। ऊपरी दृष्टि से योग के यह मार्ग परस्पर भले ही भिन्न हैं परंतु मंजिल सबकी एक ही है। प्रारंभ सबका अलगअलग है परंतु अंत एक ही है।फिर उसे मंत्र योग कहो या हठ योग, राज योग कहो या ज्ञान योग, भक्ति योग कहो या कर्म योग या फिर ध्यान योग। नाम और मार्ग ही भिन्न हैं परिपाम सबका एक है। किस तरह व कितने भिन्न हैं आपस में यह योग, यह जानना जरूरी है, जो इस प्रकार है

मंत्रयोग

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