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प्राणमय कोष साक्षी विवेक

May 2024

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Rishi Prasad Hindi

(अंक ३७५ में आपने 'पंचकोष-साक्षी विवेक' के अंतर्गत 'अन्नमय कोष साक्षी विवेक' के बारे में जाना। उसी क्रम में अब आगे...)

- स्वामी अखंडानंदजी

प्राणमय कोष साक्षी विवेक

अन्नमय कोष से आंतर (भीतर) और इसमें व्याप्त एक और शरीर है जो अन्नमय कोष की गति, क्रिया और कर्म के लिए उत्तरदायी है। इसको प्राणमय कोष कहते हैं। प्राण और कर्मेन्द्रियाँ इसके अवयव हैं।

{श्रीमद् आद्य शंकराचार्यजी के अनुसार 'पाँच कर्मेन्द्रियों से युक्त यह प्राण ही प्राणमय कोष कहलाता है, जिससे युक्त यह अन्नमय कोष अन्न से तृप्त होकर समस्त कर्मों में प्रवृत्त होता है। प्राणमय कोष भी आत्मा नहीं है क्योंकि यह वायु का विकार है, वायु के समान ही बाहर-भीतर जाने-आनेवाला है और नित्य परतंत्र है। यह कभी अपना इष्ट-अनिष्ट, अपना-पराया भी कुछ नहीं जानता।' (विवेक चूड़ामणि: १६७, १६८)

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