يحاول ذهب - حر
कालिंजर जहाँ शिव ने विष पीड़ा को तपस्या में बदल दिया
February 2026
|Jyotish Sagar
विषपान के बाद उत्पन्न असह्य जलन और वेदना को शान्त करने के लिए भगवान् शंकर विभिन्न स्थानों पर रुके, इन्हीं स्थानों में एक प्रमुख स्थान कालिंजर है।
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तीर्थयात्रा नामक स्थायी स्तम्भ में 'महाशिवरात्रि' के शुभ अवसर पर ऐसे शैव तीर्थस्थल का परिचय दे रहे हैं, जहाँ स्वयं भगवान् शिव को पीड़ा से शान्ति मिली। उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित कालिंजर ऐसा ही एक रहस्यमय, प्राचीन और आध्यात्मिक रूप से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। यह वही भूमि मानी जाती है, जहाँ समुद्र मन्थन के दौरान उत्पन्न कालकूट विष की तीव्र वेदना को भगवान् शंकर ने शान्त किया था। इसी कारण यह स्थान शिवभक्तों के लिए विशेष पुण्यकारी माना जाता है। पुराणों के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति हेतु समुद्र मन्थन किया, तब सर्वप्रथम कालकूट विष उत्पन्न हुआ। यह विष इतना प्रचण्ड था कि तीनों लोकों में त्राहि-त्राहि मच गई। देवताओं के अनुरोध पर भगवान् शिव ने लोककल्याण के लिए उस विष का पान कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कण्ठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकण्ठ' कहलाए।
هذه القصة من طبعة February 2026 من Jyotish Sagar.
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