يحاول ذهب - حر
सुख-सम्पत्ति का रहस्य और नवग्रहों का प्रभाव
August 2025
|Jyotish Sagar
गृहसुख अर्थात् वह आनन्द और सन्तोष जो किसी व्यक्ति को अपने निवास स्थान, परिवार, जीवनसाथी, सन्तान और भौतिक सम्पत्ति से प्राप्त होता है। यह जीवन की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण जरूरत है।
जहाँ एक ओर आध्यात्त्मिक उन्नति आत्मा की शान्ति से जुड़ी है, वहीं गृहसुख जीवन की संतुलित और स्थिर धारा का प्रतीक है। इस सुख की प्राप्ति केवल मेहनत, धैर्य और समझदारी से ही नहीं होती, वरन् इसकी जड़ें हमारे जन्मकालीन ग्रहों की स्थिति में भी गहराई से समाई होती हैं।
यही कारण है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने ज्योतिष शास्त्र की रचना की, ताकि मानव जीवन के प्रत्येक पहलू की समझ हमें आ सके और हम अपने दुःखों के कारण को जानकर उससे निवारण कर सकें।
प्राचीन भारतीय ज्योतिष, जिसे 'वैदिक ज्योतिष' भी कहा जाता है, का प्रमुख उद्देश्य केवल भविष्यवाणी करना नहीं है, वरन् यह बताना भी है कि ग्रहों की कौन-सी स्थिति जीवन के किन पक्षों को प्रभावित करती है? जन्मकुण्डली के द्वादश भावों में से चतुर्थ भाव को सुख भाव कहा गया है। यह भाव दर्शाता है कि व्यक्ति को अपने जीवन में स्थायी सुख, गृह सम्पत्ति, वाहन, माता का सुख, शान्ति और जीवन का आधार कितना मिलेगा? इस भाव के स्वामी ग्रह उस पर दृष्टि डालने वाले अन्य ग्रह और इस भाव में बैठे हुए ग्रह मिलकर जातक के गृहसुख की कहानी कहते हैं।
यदि किसी जातक की जन्मपत्रिका में चतुर्थ भाव मजबूत होता है, उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि होती है और वहाँ स्थित ग्रह शुभता प्रदान करते हैं, तो उस व्यक्ति को जीवन में स्थायित्व, घर का आनन्द, सम्पत्ति और मानसिक सन्तोष भरपूर मिलता है, वहीं यदि यह भाव नीच ग्रहों से पीड़ित हो अथवा शत्रु ग्रह यहाँ स्थित हों, तो जातक को बार-बार घर बदलने की नौबत आती है, माता से दुराव होता है अथवा जीवन में कभी खत्म नहीं होने वाली अशान्ति बनी रहती है। इसके साथ ही चतुर्थ भाव का सम्बन्ध मन से भी माना गया है, अतः मानसिक शान्ति और घर के भीतर की भावनात्मक स्थिरता इसी भाव पर निर्भर करती है।
هذه القصة من طبعة August 2025 من Jyotish Sagar.
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