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يحاول ذهب - حر

किस्तों से पूरे होते छोटे-बड़े सपने

July 06, 2025

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Dainik Bhaskar Mandla

पारंपरिक धारणाओं में ईएमआई (यानी कर्ज लेकर कोई काम करना) को कभी गलत माना जाता था, लेकिन अब यह न केवल एक बड़े वर्ग की महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को पूरा करने का एक वैध तरीका बन गया है, बल्कि इसे अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाले बड़े फैक्टर के रूप में भी देखा जा रहा है।

- अजीत कुमार

'अपने घर' का सपना तो आम व्यक्ति कर्ज लिए बगैर पूरा कर भी नहीं सकता। लेकिन इस समय आरबीआई की चिंता इस बात को लेकर है कि लोग अन्य मदों के लिए भी बेतहाशा लोन ले रहे हैं। इस तरह के कर्ज को 'नॉन हाउसिंग रिटेल लोन' कहा जाता है। पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड के जरिए लिया गया लोन, कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन वगैरह इसी कैटेगरी में आते हैं। आरबीआई की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट कहती है कि मार्च 2025 तक कुल घरेलू कर्ज में नॉन हाउसिंग रिटेल लोन 54.9 फीसदी हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इतने अधिक कर्ज की वजह से आम आदमी की खर्च योग्य आय का 25.7 फीसदी हिस्सा यानी एक चौथाई इसकी ईएमआई चुकाने में जा रहा है। इसने हाउसिंग लोन को भी पीछे छोड़ दिया है। अब आय का औसतन 14.7 फीसदी हिस्सा ही हाउसिंग लोन की ईएमआई में खर्च हो रहा है। हालांकि दोनों को मिला दिया जाएं तो यह आय का औसतन करीब 40 फीसदी हिस्सा हो जाता है।

एक साल में ही कर्ज 10.8% बढ़ा

लोन लेने की बढ़ती प्रवृत्ति की वजह से भारत में उधारकर्ताओं के ऊपर कर्ज का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। इस बात का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि मार्च 2025 के अंत तक प्रत्येक उधारकर्ता पर औसत कर्ज बढ़कर 4.8 लाख रुपए पहुंच गया। ठीक एक साल पहले (मार्च 2024) की तुलना में यह 10.8 फीसदी, जबकि दो साल पहले (मार्च 2023) की तुलना में यह 23 फीसदी ज्यादा है। हालांकि ईएमआई ने उपभोक्ताओं की वित्तीय जागरूता में बढ़ोतरी की है। बीसीजी और फिक्की की एक अध्ययन रिपोर्ट कहती है कि ईएमआई का इस्तेमाल करने वालों में से 67 फीसदी लोग नियमित रूप से क्रेडिट स्कोर चेक करते हैं, जबकि ईएमआई इस्तेमाल न करने वालों में यह आंकड़ा 15 फीसदी का है।

पहली बार कर्ज, औसत उम्र घटी

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