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कपड़ा उद्योग की चुनौतियां आखिरकार हो रहीं कम

December 25, 2025

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Business Standard - Hindi

वस्त्र और परिधान के क्षेत्र में भारत की लंबी गिरावट का कारण कोई दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति या कमजोर कारखाने नहीं थे, बल्कि खराब नीतियां थीं।

कई वर्षों तक अपने ही सिंथेटिक उद्योग को नुकसान पहुंचाने के बाद, आखिरकार देश उन बाधाओं को दूर कर रहा है जिन्होंने इसे पीछे रखा था।नीति में सुधार शुरू हो गया है ऐसे में अब क्रियान्वयन, उद्योग का दायरा और गति सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। अब बदलाव शुरू हो सकता है।

पिछले साल चीन ने 113 अरब डॉलर के परिधानों का निर्यात किया, बांग्लादेश ने 51 अरब डॉलर और वियतनाम ने 39 अरब डॉलर का निर्यात किया जबकि भारत, कपड़ा के क्षेत्र में अपनी समृद्ध विरासत के बावजूद केवल 17 अरब डॉलर का निर्यात कर पाया।

कपड़ा क्षेत्र में भारत क्यों है कमजोर:

भारत ने उस सिंथेटिक कपड़ा क्रांति पर ध्यान नहीं दिया जो वैश्विक परिधान व्यापार के 70 प्रतिशत हिस्से को चलाती है। सिंथेटिक कपड़ों के दम पर स्पोर्ट्सवियर, विंटरवियर, एथलीजर और फास्ट फैशन को ताकत मिलती है जिन श्रेणियों का अमेरिका, यूरोप और पूर्वी एशिया में दबदबा है।

वियतनाम और बांग्लादेश ने इस मांग को पूरा करने के लिए सुगम, कम लागत वाली सिंथेटिक कपड़ों की आपूर्ति श्रृंखलाएं बनाईं। भारत कपास से चिपका रहा और यही नहीं उसने शुल्क, एंटी-डंपिंग कदमों और व्यापक गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (क्यूसीओ) के माध्यम से सिंथेटिक कपड़ों को काफी महंगा बना दिया, जिससे आयात प्रतिबंधित हो गया और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) सर्दियों के कपड़ों (विंटरवियर) के क्षेत्र से तेजी से बाहर हो गए। इसका सीधा असर कारखाने में दिखाई देता है। भारत के अधिकांश कारखाने कपास वाले वसंत और गर्मियों के सीजन के दौरान ही पूरी क्षमता से चलते हैं और शरद ऋतु तथा सर्दियों में यहां निष्क्रियता बनी रहती हैं, जब सिंथेटिक कपड़ों के बलबूते वैश्विक ऑर्डर मिलता है। तो इन कारखानों पर लागत तो साल भर रहती है, लेकिन राजस्व नहीं। आधुनिक परिधान के विकास इंजन सिंथेटिक कपड़ों को अनदेखा करके, भारत ने अपने वस्त्र उद्योग को एक तरह से पंगु बना दिया है जिससे उत्पादन सीमित हो गया, मजदूरी घट गई और उस क्षेत्र में बाजार हिस्सेदारी खो गई जहां भविष्य टिका हुआ है। अच्छी खबर यह है कि अब ऐसी स्थिति नहीं है।

चार सुधार:

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