يحاول ذهب - حر
महिलाएं कब तक उठाएंगी परिवार नियोजन का बोझ
December 28, 2025
|Aaj Samaaj
भारत सहित दुनिया के कई देशों में जनसंख्या नियंत्रण के लिए नसबंदी को सबसे प्रभावी स्थायी समाधान माना जाता है, लेकिन जब हम देश और प्रदेश में नसबंदी के आंकड़ों और सामाजिक स्वीकार्यता को देखते हैं तो इसमें एक गहरा लैंगिक भेदभाव उभर कर सामने आता है। यह विडंबना है कि जैविक रूप से पुरुष नसबंदी अधिक सरल, सुरक्षित और कम खचीर्ली है
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महिला नसबंदी एक सर्जिकल प्रक्रिया है, जिसके लिए अधिक समय और रिकवरी की आवश्यकता होती है, जबकि पुरुष नसबंदी एक छोटी और कम जोखिम वाली प्रक्रिया है। इस असमानता को दूर करने के लिए परिवार नियोजन को एक साझा जिम्मेदारी के रूप में बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। यूं तो परिवार नियोजन किसी भी समाज और परिवार के स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। भारत सहित दुनिया के कई देशों में जनसंख्या नियंत्रण के लिए नसबंदी को सबसे प्रभावी स्थायी समाधान माना जाता है, लेकिन जब हम देश और प्रदेश में नसबंदी के आंकड़ों और सामाजिक स्वीकार्यता को देखते हैं तो इसमें एक गहरा लैंगिक भेदभाव उभर कर सामने आता है। यह विडंबना है कि जैविक रूप से पुरुष नसबंदी अधिक सरल, सुरक्षित और कम खचीर्ली है, फिर भी नसबंदी का लगभग पूरा बोझ महिलाओं के कंधों पर डाल दिया गया है। ऐसा करके इस समाज ने परिवार नियोजन की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं पर ही डाल दी है। आधुनिक जमाने में भी ऐसा हो रहा है। आखिर क्यों? बड़ा सवाल है कि क्या समाज व परिवार कल्याण की जिम्मेदारी केवल महिलाओं की ही है। देश में परिवार नियोजन के लिए नसबंदी के आंकड़े एक महत्वपूर्ण लैंगिक असंतुलन दिखाते हैं। महिलाओं द्वारा नसबंदी करवाने की दर पुरुषों की नसबंदी की तुलना में काफी अधिक है। यह अंतर विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों का परिणाम है, जो परिवार नियोजन को लेकर पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाओं को प्रभावित करते हैं। अगर हम इसके कारणों की तह में जाते हैं तो देखते हैं कि कई समाज में परिवार नियोजन की जिम्
هذه القصة من طبعة December 28, 2025 من Aaj Samaaj.
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