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हरियाणा में चौपालों का वर्चस्व-लोकतंत्र की जड़ें या परंपरा की जंजीर ?
June 01, 2025
|Aaj Samaaj
हरियाणा की ग्रामीण संस्कृति में 'चौपाल' सिर्फ एक बैठने की जगह नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और कभी-कभी राजनीतिक निर्णयों का अनौपचारिक मंच रही है।
यह जगह जहाँ बुजुर्ग अपनी ताश की गड्डी के साथ बैठते हैं, वहीं यह सामाजिक आचार-संहिताओं का अनकहा विधान भी तय करती है। लेकिन समय के साथ सवाल यह उठने लगा है कि क्या यह चौपालें लोकतंत्र की संवैधानिकता से ऊपर होती जा रही हैं?
हरियाणा के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में चौपाल महज एक बैठने की जगह नहीं, बल्कि एक परंपरा, एक सत्ता संरचना, और एक अनौपचारिक न्याय प्रणाली रही है। पीपल के पेड़ के नीचे या पक्के चबूतरे पर बैठकर जब गाँव के बुजुर्ग चर्चा करते हैं, तो उसे आम भाषा में "चौपाल" कहा जाता है। पर यह चौपाल सिर्फ बतकही तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक दिशा तय करने वाली संस्था बन गई है। लेकिन आज सवाल यह है कि क्या यह वर्चस्व सकारात्मक है या फिर यह लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण समाज के रास्ते में रोड़ा बन रहा है?
ऐतिहासिक पृष्ठभूमिः चौपालों की भूमिका
हरियाणा में जब पंचायतें पूरी तरह विकसित नहीं हुई थीं, तब चौपालों का महत्व और अधिक था। गाँव का कोई भी मामला झ जमीन का झगड़ा हो, विवाह संबंध तय करना हो या किसी के बहिष्कार का निर्णय झ सब चौपाल में होता था। यह स्थानीय स्वशासन का प्रतीक था, जो सामूहिक संवाद के सिद्धांत पर टिका था। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, लोकतंत्र की संस्थाएं, पंचायत चुनाव, पुलिस-प्रशासन और अदालतें सशक्त हुईं, वैसे-वैसे चौपालों की भूमिका को भी बदल जाना चाहिए था। परंतु हरियाणा में आज भी चौपालें सामाजिक फैसलों की "अनौपचारिक अदालत" बनी हुई हैं।
चौपाल बनाम संविधानः एक टकराव
भारत का संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है इझ जाति, लिंग, धर्म या वर्ग के आधार पर भेदभाव की मनाही है। वहीं चौपालों में अक्सर फैसले जातिगत पदानुक्रम पर आधारित होते हैं। जैसे किः "इस जाति के लड़के को उस जाति की लड़की से शादी नहीं करनी चाहिए।" "उसने पंचायत के बिना शादी की है, इसलिए उसका बहिष्कार होगा।" ये निर्णय संविधान की मूल भावना के विरुद्ध हैं। खासकर महिलाओं और दलितों को चौपाल में बोलने का अवसर कम ही मिलता है। अधिकतर मामलों में चौपालें पितृसत्ता और जातिवाद का किला बन जाती हैं।
هذه القصة من طبعة June 01, 2025 من Aaj Samaaj.
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