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हिंदी पत्रकारिता के सामने चुनौतियां कल भी थी और आज भी है

May 30, 2025

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Aaj Samaaj

हिंदी पत्रकारिता के सामने चुनौतियां कल भी थी और आज भी है। यह देश हिंदी भाषी है इस दृष्टि से समाज में जागरूकता फैलाने और लोगों को शिक्षित करने में हिंदी पत्रकारिता का दायित्व भी बढ़ जाता है। हिंदी पत्रकारिता को आज चौतरफा खतरे का सामना करना पड़ रहा है। कहीं शासन के कोपभाजन का सामना करना पड़ता है तो कहीं राजनीतिज्ञों, बाहुबलियों और अपराधियों से मुकाबला करना पड़ता है। समाज कंटकों के मनमाफिक नहीं चलने का खामियाजा प्रेस को भुगतना पड़ता है।

हिंदी पत्रकारिता के सामने चुनौतियां कल भी थी और आज भी है

द्विवेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, शिव प्रकाश गुप्त, आचार्य शिवपूजन सहाय, बनवारीदास चतुवेर्दी, माधव राव सप्रे, बाबूराव विष्णुराव पराड़कर, मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी, अज्ञेय और धर्मवीर भारती सरीखे पत्रकारों ने हिंदी पत्रकारिता को सम्मानजनक स्थान पर पहुंचाया। हिंदी पत्रकारिता के सामने चुनौतियां कल भी थी और आज भी है। यह देश हिंदी भाषी है इस दृष्टि से समाज में जागरूकता फैलाने और लोगों को शिक्षित करने में हिंदी पत्रकारिता का दायित्व भी बढ़ जाता है। हिंदी पत्रकारिता को आज चौतरफा खतरे का सामना करना पड़ रहा है। कहीं शासन के कोपभाजन का सामना करना पड़ता है तो कहीं राजनीतिज्ञों, बाहुबलियों और अपराधियों से मुकाबला करना पड़ता है। समाज कंटकों के मनमाफिक नहीं चलने का खामियाजा प्रेस को भुगतना पड़ता है। दुनिया भर में प्रेस को निशाना बनाया जा रहा है। रिपोर्टिंग के दौरान मीडियाकर्मी को कहीं मौत के घाट उतारा जाता है तो कहीं जेल की सलाखों की धमकियाँ दी जाती है। मीडिया पर भी आरोप है कि वह अपनी जिम्मेदारियों का सही तरीके से निर्वहन नहीं कर पा रहा है। कहा जा रहा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हमारे सामाजिक सरोकारों को विकृत कर बाजारू बना दिया है। बाजार ने हमारी भाषा और रचनात्मक विजन को नष्ट भ्रष्ट करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। ऐसे में प्रेस की चुनौतियों को नए ढंग से परिभाषित करने की जरुरत है। हिंदी के समाचार पत्रों के सामने एक नहीं हजार चुनौतियां है। आज कुकुरमुत्ते की तरह हिंदी अखबारों की बाढ़ सी आ गई है। हिंदी समाचार पत्रों को वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है, जिसके कारण वे पत्रकारों को उचित वेतन और सुविधाएं नहीं दे पाते हैं। जिम्मेदारी बढ़ी है मगर उसके अनुपात में आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। कुछ बड़े अखबारों की बात छोड़ दें तो हिंदी अखबारों को सरकार के विज्ञापनों के भरोसे जिन्दा रहना पड़ता है। ऐसे में अपने पत्रकारों की आर्थिक दिक्कतों को अखबार पूरा नहीं कर पाते। बहुत से अखबार इस दौरान बंद हो जाते है और पत्रकार बेरोजगार। इस विषम स्थिति पर आज गहन चिंतन और मनन की जरुरत है। हिंदी पत्रकारिता को आज चौतरफा खतरे का सामना करना पड़ रहा है। कहीं शासन के कोपभाजन का सामना करना पड़ता है तो कहीं राजनीतिज्ञों, बाहुबलियों और अपराधियों से मुकाबला करना पड़ता है। समाज कंटकों के मनमाफि

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