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क्या धर्म व धर्मगुरुओं को राजनीति से दूर रखना संभव है ?

July 2024

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Open Eye News

हाल ही में महाराष्ट्र में ज्योतिर्मठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बयान पर जहां राजनीति गरमाई हुई है तो वहीं दूसरी ओर शंकराचार्य अपने बयान पर कयाम बने हुए हैं।

- अशोक भाटिया

क्या धर्म व धर्मगुरुओं को राजनीति से दूर रखना संभव है ?

शंकराचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है कि राजनीति के लोग धर्म में हस्तक्षेप बंद करें। हम भी राजनीति में बोलना बंद कर देंगे। एक अन्य वीडियो में शंकराचार्य ने कहा है कि हमसे बड़े नरेंद्र मोदी का कोई हितैषी नहीं है। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती उद्योगपति मुकेश अंबानी के बेटे अनंत और राधिक मर्चेंट की शादी के बाद आशीर्वाद देने के लिए मुंबई गए थे। अपने इस प्रवास में शंकराचार्य बुलावे पर राज्य में पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के घर पर भी गए थे। मातोश्री में ठाकरे परिवार के पास रुकने के बाद ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा था कि उद्धव ठाकरे के साथ विश्वासघात हुआ है। हिंदु धर्म में यह सबसे बड़ा पापा है। इससे बहुत लोगों के मन में पीड़ा है। उनके दोबारा मुख्यमंत्री बनने पर यह पीड़ा दूर होगी। उद्धव ठाकरे के फिर सीएम बनने पर पीड़ा दूर होने वाले बयान पर शंकराचार्य की भले ही काफी आलोचना हुई। सोशल मीडिया पर काफी टिप्पणियां सामने आई। पर यदि हम इतिहास को देखे तो भारत के इतिहास में धर्म और राजनीति दोनों सदियों से व्यक्ति और समाज पर गहरा प्रभाव डालते आए है। आजादी के बाद के अगर इतिहास के पन्नों को पलटे तो साफ पता चलता है कि धार्मिक केंद्र राजनीतिक सत्ता के केंद्रों के तौर पर कार्य करते आए है। वहीं आज जहां एक ओर देश में एक ओर दक्षिण से लेकर उत्तर के कई राज्यों में मठ-मंदिर सत्ता के शक्तिशाली केंद्र के रूप में नजर आते है तो दूसरी ओर इनके पीठाधीश्वर को राजनीति में खूब पंसद आ रही है। धर्म और राजनीति का मेल होना चाहिए या नहीं, इस पर पहले भी व्यापक बहस होती रही है। एक वर्ग यह मानता है कि धर्मविहीन राजनीति अपना उद्देश्य कभी पूरा नहीं कर पाती। धर्म के बिना राजनीति मधु के बिना मधुमक्खियों के छत्ते की तरह है, जो सिर्फ लोगों को काट ही सकती है। इस तर्क में भी तभी तक दम है जब तक धर्म को उसके सच्चे अर्थों में स्वीकार किया जाए। ऐसे भारतीय इतिहास में ऐसे असंख्स उदाहरण मौजूद हैं जब शासनाध्यक्षों ने अपने समय के सिद्ध धर्माचार्यों की शरण में रह कर उनके दिग्दर्शन में राजकाज चलाया। लेकिन वैसे धर्माचार्य कभी शासनाध्यक्ष नहीं बने। लेकि

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