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नहीं रहेंगे हिंदू धर्म में, मंशा क्या

July 30, 2025

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India Today Hindi

जनगणना की कवायद की भनक लगते ही प्रदेश के कुड़मी समुदाय में खुद को आदिवासी श्रेणी में रखे जाने की मांग शुरू. लेकिन विशेषज्ञ मजबूत तर्कों के साथ उनके दावे नकार रहे

- आनंद दत्त

नहीं रहेंगे हिंदू धर्म में, मंशा क्या

राजधानी रांची से 140 किलोमीटर दूर धनबाद जिले के निचितपुर गांव के संजय महतो की मां शोभनी देवी का 10 जुलाई को देहांत हो गया. श्राद्धकर्म के लिए उन्होंने अपनी जाति के पाहन यानी धार्मिक अनुष्ठान कराने वाले बीरू महतो कड़आर को बुलाया. इससे पहले 2016 में दादा की मृत्यु के बाद पूर्व की परंपराओं के अनुसार ब्राह्मण को बुलाकर श्राद्धकर्म करवाया था. बीरू के दावों के मुताबिक, केवल झारखंड में उनके जैसे 3,000 से ज्यादा 'पाहन' प्रशिक्षण लेकर अपने समाज में धार्मिक कार्य करा रहे हैं. गांव के मुखिया महादेव कड़आर के घर में बने तुलसी चौरा पर लगी भगवान की तस्वीरों को हटा दिया गया है. इसी गांव की पारो महताइन, सुनीता महताइन, आरती महताइन जैसी सैकड़ों महिलाओं ने छठ, मंदिर में पूजा आदि को छोड़ दिया है. ये महिलाएं पहले अपने नाम के आगे देवी इस्तेमाल करती थीं, अब महताइन लिखती हैं. दरअसल, झारखंड में ओबीसी कैटेगरी में शामिल कुड़मी समुदाय के लोग खुद को हिंदू धर्म से अलग कर रहे हैं. वे खुद को आदिवासी मान रहे हैं.

ऐसा केवल धनबाद के एक गांव में नहीं चल रहा, बल्कि रांची, रामगढ़, धनबाद, बोकारो, सरायकेला-खरसांवा, गिरिडीह, चतरा, कोडरमा, गोड्डा जैसे जिलों में रह रहे कुड़मी जाति के कुल 81 गोत्र के लोग हिंदू धर्म के रीति-रिवाज छोड़ रहे हैं. इसके लिए गांव-गांव में अभियान चलाया जा रहा है. समुदाय के लोग घरों से हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीर, झंडे आदि हटा रहे हैं. किसी के मरने के बाद होने वाले कर्मकांड में पूर्व में अपनाई गई हिंदू पद्धति यानी श्राद्ध-कर्म को छोड़ रहे हैं. इस समुदाय के लोगों की संख्या अच्छी-खासी है. 2011 की जनगणना के मुताबिक, प्रदेश की आबादी 3.3 करोड़ है. अनुमान है कि इसमें लगभग 16 फीसद कुड़मी जाति के लोग हैं. फिलहाल इन्हें राज्य में ओबीसी का दर्जा मिला हुआ है.

निचितपुर गांव के रामप्रसाद महतो कडुआर का मानना है कि उनके समुदाय का जिक्र किसी भी हिंदू धर्मग्रंथ में नहीं है. आजादी से पहले 1931 में हुई जनगणना में इस समुदाय को आदिम जनजाति कैटेगरी में रखा गया था. लेकिन 1951 की जनगणना में इन्हें किसी कैटेगरी में नहीं रखा गया. रामप्रसाद कहते हैं, "हम जनजाति में शामिल होने के लिए अभियान चला रहे हैं."

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