يحاول ذهب - حر
सोशल मीडिया ने फिर पैदा किए जाति के टोले
February 2025
|Mukta
सोशल मीडिया कोई दूसरी दुनिया की चीज नहीं है, यह वह भौंडी, सड़ीगली जगह है जो आम लोग बाहर की दुनिया में भीतर से महसूस करते हैं और अपनी उलटी बेझिझक यहां उड़ेलते हैं. भड़ास के ये वे अड्डे हैं जहां वे अपनी असल पहचान जाहिर करते हैं.
भारत ऐसा देश है जहां विविधता और संस्कृति की आड़ में ऊंची जातियां जातिवाद के बहाव में आने से नहीं कतरातीं. यहां अलगअलग भाषाएं, खानपान और रहनसहन का मोजैक बेशक है मगर संप्रदायों और जातियों के तनाव की ऊंची दीवारें भी हैं, जो सदियों से हमारे समाज को विभाजित करती आई हैं.
जाति व्यवस्था भारतीय समाज की ऐसी वास्तविकता है जिस ने न केवल हमारे गांवों और शहरों को बांटा है, बल्कि अब यह डिजिटल दुनिया में भी अपनी जड़ें जमा चुकी है. यहां तक कि सोशल मीडिया का मंच भी जाति के टोलों में बंट चुका है.
फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफोर्म्स पर जाति का प्रदर्शन, जातिवादी टिप्पणियां और जाति आधारित ग्रुप्स ने एक नए तरह के सोशल पार्टीशन को जन्म दिया है. गांवदेहातों में जैसे बाटोला, ठाकुरबाड़ी, चमार टोला, प्रजापति महल्ला, बंसल व अहिरवार गांव हुआ करते हैं, जिन के घाट, तालाब, पगडंडियां, नल सब घंटे हुए होते हैं वैसे ही सोशल मीडिया पर जातियां बंट गई हैं. लोग अपनी जाति के मुताबिक अपने ग्रुप चुनते हैं, अपने दोस्त चुनते हैं, अपने लिए गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रैंड को चुनते हैं, कई बार शादी के लिए लड़का लड़की इन्हीं ग्रुप्स के इश्तिहारों को देखते हैं.
उपनाम के बहाने जातियों का बखान सोशल मीडिया पर ऊंची जातियों के यूजर्स उपनाम के बहाने अपनी जातियों की घोषणा करते हैं और बताते हैं कि वे शर्मा, श्रीवास्तव झा, सिन्हा, जोशी, मिश्रा, तिवारी, पांडे, चौहान, पंवार, सोलंकी राजपूत इत्यादि हैं और बाकियों से श्रेष्ठ हैं.
जातिवाद तो छोड़िए, कितने ही ऐसे कथित जातिविरोधी यूजर्स सोशल मीडिया पर जातीय उत्पीड़न संबंधित लंबीलंबी पोस्ट करते नहीं थकते पर जब उन के उपनाम की बात आती है तो गर्व से सिंह, उपाध्याय, बनर्जी, ठाकुर लगाते हैं. यह खुद को सुपीरियर या मसीहा देखने की प्रवृत्ति है जो किसी आत्ममुग्धा से कम नहीं.
هذه القصة من طبعة February 2025 من Mukta.
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