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يحاول ذهب - حر

लिखिए और टिकिए

May 2026

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Aha Zindagi

अधीरता, व्याकुलता और व्यवधान से भरी दुनिया में काग़ज़ और क़लम जैसी साधारण-सी चीजें आपको बचा सकती हैं। दिनभर स्क्रीन पर थपकतीं उंगलियां मन-मस्तिष्क को थका डालती हैं। अपनी उंगलियों को विराम दीजिए और उनमें एक क़लम थाम लीजिए।

- डॉ. निधि साहू

लिखिए और टिकिए

जीवन की सच्ची संतुष्टि तुरत-फुरत नहीं, बल्कि निरंतर प्रयासों और धैर्य से प्राप्त होती है। आज की क्लिक और स्क्रॉल वाली दुनिया में जहां सबकुछ पलक झपकते ही उपलब्ध है, लोग धैर्य और संतुष्टि दोनों को ही खोते जा रहे हैं। आज के दौर में यदि किसी प्रश्न का उत्तर चाहिए तो ‘गूगल' की सहायता से तुरंत मिल जाता है। यदि भूख लगी है तो 10 मिनट में भोजन घर पर होता है। लेकिन इस 'तुरंत' पाने की चाह ने मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार पर एक गहरा प्रभाव डाला है।

'इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन' या तत्काल संतुष्टि की लालसा वह मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है जिसमें आदमी अपनी इच्छाओं या ज़रूरतों को बिना किसी देर के तुरंत पूरा करना चाहता है। सरल शब्दों में, यह 'अभी और इसी वक़्त' परिणाम चाहने की ज़िद है। इसके चलते लोग गहरे और लंबे कार्यों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। बिना सोचे-समझे ख़र्च करने की आदत हो जाती है और जब चीज़ें तुरंत नहीं मिलतीं तो चिड़चिड़े या उदास हो जाते हैं। तत्काल संतुष्टि की यह आदत केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं है। यह हमारे वास्तविक जीवन के रिश्तों को भी प्रभावित कर रही है। लोग अब संघर्षों को सुलझाने या रिश्तों में समय निवेश करने के बजाय तुरंत ब्लॉक करने या नए विकल्प खोजने में विश्वास करने लगे हैं। कार्यक्षेत्र में भी, समय और अनुभव के साथ धीरे-धीरे मिलने वाली पदोन्नति के बजाय तुरंत परिणामों की अपेक्षा होती है। इससे कार्यक्षमता प्रभावित होती है। अब लगभग हर कोई लंबी प्रक्रिया वाली सफलता के बजाय रातोंरात मिलने वाली प्रसिद्धि की तलाश में दिखता है।

स्क्रीन ने छीन ली है संतुष्टि

सोशल मीडिया के कारण युवाओं में धैर्य की भारी कमी देखी जा रही है। आभासी संसार में जब कोई हमारी फोटो पर लाइक करता है या सकारात्मक टिप्पणी करता है तो हमें वैसी ही ख़ुशी का अनुभव होता है जैसी किसी पुरस्कार मिलने या किसी प्रतियोगिता में जीतने पर होती है। समस्या तब शुरू होती है जब हम इस छोटी और अस्थायी ख़ुशी के आदी हो जाते हैं। जब किसी पोस्ट पर उम्मीद के मुताबिक़ प्रतिसाद नहीं मिलता तो यह बेचैनी, उदासी और चिड़चिड़ेपन में बदल जाती है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि सोशल मीडिया पर अत्यधिक समय व्यतीत करना डिजिटल एंग्जाइटी और डिजिटल डिप्रेशन का कारण बन गया है।

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