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يحاول ذهب - حر

मंजिल के क़रीब गुमराह होने की चाह...

December 2025

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Aha Zindagi

पहली नज़र में यह चाहना एकदम अटपटी और अस्वाभाविक लगती है, लेकिन जब इसकी परतें खुलती हैं तो दुनियावी दौड़ के फ़लसफ़े बेमानी लगने लगते हैं।

- – आशीष दशोत्तर

मंजिल के क़रीब गुमराह होने की चाह...

मिरे राहबर मुझको गुमराह कर दे, सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है।

उर्दू ग़ज़ल को अपने लबोलहज़े और बारीकियों से सराबोर करने वाले उस्ताद शायर ख़ुमार बाराबंकवी साहब का यह शेर बने-बनाए फ़लसफ़े को पलटने वाला है। बहुत सादा जुबान में कहा गया यह शेर कई तहें खोलता है और एक नए आयाम की तरफ़ हमें ले जाता है।

शेर के शाब्दिक अर्थ पर ग़ौर करें तो राही शायद राह बताने वाले से कह रहा है कि वह उसे गुमराह कर दे, क्योंकि मंज़िल क़रीब आ गई है। यहां समझ यह नहीं आता है कि मंज़िल के क़रीब आने पर गुमराह होने का क्या रिश्ता है।

अमूमन तो चाहत यही रहती है कि जल्द से जल्द मंज़िल तक पहुंच जाएं। राह दिखाने वाला भी यह दुआ करता है कि राहगीर को इस मोड़ पर कोई गुमराह न कर दे, क्योंकि मंज़िल सामने ही दिख रही है। यह तो वैसा ही हुआ कि सांप-सीढ़ी के खेल में कोई आख़िरी ख़ाने तक पहुंचते-पहुंचते यह कामना करने लगे कि उसे सांप काट ले और फिर से वह पीछे की तरफ़ लौट जाए। यह मुमकिन नहीं, कोई ऐसा नहीं चाहेगा। लेकिन इस शेर में अगर शायर इस बात की ताईद कर रहा है कि मंज़िल से पहले राहगीर को गुमराह कर दिया जाए तो इसके पीछे बहुत गहरे संदर्भ छिपे हुए हैं।

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