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भगवान श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन
August 2024
|Sadhana Path
भगवान विष्णु के आठवें अवतार कृष्ण को निष्काम कर्मयोगी एवं दार्शनिक भी माना जाता है। भगवद्गीता में वर्णित उनका उपदेश जीवन जीने की कला का मार्गदर्शन करता है।
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क्रियाशीलता जीवन है और निष्क्रियता साक्षात् मृत्यु है। रोटी, कपड़ा और मकान ये जीवन की तीन सबसे बड़ी जरूरते हैं, इन तीनों की प्राप्ति के लिए क्रियाशील होना बहुत जरूरी है। जीवन में सुख, दुःख दोनों आते हैं, दोनों ही स्थिति में क्रियाशीलता बहुत जरूरी है। भगवान विष्णु के दशावतारों में से एक भगवान श्री कृष्ण को कर्मवाद का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। कर्म ही पूजा है, ऐसा कहा भी गया है। जीवन रूपी गाड़ी चलाने के लिए सक्रियता बहुत आवश्यक है। भगवान श्री कृष्ण के जन्म दिन को हर वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के रूप में पूरे देश में मनाया जाता है। इस वर्ष भी 23 अगस्त को पूरे देश में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन हर ओर भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे लगते हैं, पूरा देश भगवान श्री कृष्ण का उपासक बन जाता है, लेकिन भगवान श्री कृष्ण की आराधना केवल भजन, कीर्तन, प्रसाद वितरण तक ही सीमित नहीं है, उसे भारतीय जीवन दर्शन के रूप में अगर देखना है तो भगवान श्री कृष्ण के कर्मवाद को समझना बहुत आवश्यक है।
श्रीमद्भागवत गीता में कहा भी गया है कि 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचनः' इसका आशय यह है कि कर्म करो पर फल की इच्छा मत करो। जब भगवान कोई काम करने की बात करते हैं तो उनका आशय सद्कर्म करने से ही होता है। दुष्कर्म करने वाला पाप का भागी होता है और सत्कर्म करने वाला पुण्य अर्जन करता है। विश्व के सभी धर्मों में कहा गया है कि हम जो कर्म करते हैं, वैसा ही फल हम प्राप्त करते हैं। दूसरे शब्दों में इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि हम जैसा बीज बोएंगे, वैसा ही फल हमें प्राप्त होगा। ईश्वर न्यायशील है, वह अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे कर्मों का बुरा फल ही देता है।

هذه القصة من طبعة August 2024 من Sadhana Path.
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