बाढ़ नुकसान में कमी और प्रतिरोध क्षमता
Bhugol aur Aap|February 2020
भारत की लगभग 12 प्रतिशत भूमि बाढ़ की चपेट में है। अल्पावधि में भारी वर्षा; अपर्याप्त जलाशय विनियमन; नालियों द्वारा कम पानी वहन क्षमता क्षमता और तटबंध जैसी बाढ़ प्रबंधन संरचनाओं की विफलता बाढ़ को भीषण बनाने में मदद करते हैं। भारत के उत्तरी, उत्तरी पूर्वी और तटीय राज्यों में बाढ़ से जीवन, आजीविका, बुनियादी ढांचे, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को काफी नुकसान होता है।
सूर्य प्रकाश और हरजीत कौर

भारत, दुनिया में सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित देशों में से एक है। प्रत्येक वर्ष भारत के विभिन्न राज्यों में बाढ़ की पुनरावृत्ति होती है जिससे लोगों को व्यापक दुख होता है तथा अर्थव्यवस्था व पर्यावरण को नुकसान होता है। बाढ़ से औसत वार्षिक हानि लगभग 7.4 बिलियन अमेरिकी डालर होने का अनुमान है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार 30 से 60 साल के बीच के लोग ऐसे खतरों के सबसे आम शिकार हैं। हाल के वर्षों में भारत में भीषण बाढ़ की मुख्य वजह भारी वर्षा रही है जैसे कि; गुजरात-2017, केरल-2018, कर्नाटक-2019, सिक्किम-2019, असम-2019। वर्ष 2013 में भारत ने प्राकृतिक आपदा के दोहरे झटके महसूस कियाः ओडिशा में चक्रवात फाइलिन और उत्तराखंड में बाढ़। उत्तराखंड में बाढ़ और उससे जुड़े भूस्खलन से 661 मिलियन डॉलर से अधिक की क्षति हुई और 4000 की मौत हो गई, जो 2004 की सुनामी के बाद भारत में भीषणतम आपदाओं में से एक थी। जलवायु परिवर्तन और तेजी से अनियमित शहरीकरण की वजह से भारतीय शहरी केंद्रों में बाढ़ का खतरा और बढ़ा गया है। वर्ष 2007 से ग्लोबल फैसिलिटी फॉर डिजास्टर रिडक्शन एंड रिकवरी (जीएफडीआरआर) और विश्व बैंक ने नुकसान, नुकसान की भारपायी और अतिरिक्त समर्थन की बेहतर समझ के माध्यम से भारत में आपदा जोखिम शमन को अत्याधुनिक बनाने का समर्थन किया है।

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