बालक गृहपति की एकनिष्ठता
Rishi Prasad Hindi|October 2021
जिसके जीवन में संयम, व्रत, एकाग्रता और इष्ट के प्रति दृढ़ निष्ठा है, उसके जीवन में असम्भव कुछ नहीं है।
पूज्य बापूजी

सौ यज्ञों से भी अधिक पुण्य पचाक्षर मत्र का जप करते हुए शिवमूर्ति-पूजन करने से होता है किंतु शिवलिंग का ॐकार मंत्र से पूजन उससे भी अधिक पुण्यदायी है। और अंतरात्मा शिव का एकांत में चिंतन करके ध्यानमग्न होना तो जीव को ऐसी ऊँची दशा देता है कि परम आनंदस्वरूप आत्मा में उसकी स्थिति होने लगती है।

एक पौराणिक कथा है । गृहपति नामक एक बालक, जिसकी उम्र ९ साल थी, उसकी माता शुचिष्मती और पिता मुनि विश्वानर थे । देवर्षि नारदजी ने उसकी हस्तरेखा देखकर चिंता व्यक्त की कि ''१२वें वर्ष में इसके ऊपर बिजली अथवा अग्नि द्वारा विघ्न आयेगा।"

ज्यों लड़का १० साल का हुआ त्यों माँबाप चिंतित होने लगे।

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