केवल नारियों की निंदा का आरोप झूठा है
Rishi Prasad Hindi|May 2021
विकारी सुखों को जब तक भोगा नहीं तब तक आकर्षक लगते हैं और भोगो तो पछताना ही पड़ता है।

('नारी का सम्मान व अपमान कब ?' अंक ३३८ से आगे)

प्रश्न : जब नारी और नर दोनों के शरीर मायिक अथवा प्राकृत हैं और दोनों ही आत्मदृष्टि से शुद्ध चेतन हैं तब केवल नारियों की ही इतनी निंदा क्यों?

स्वामी अखंडानंदजी : शास्त्र का अभिप्राय केवल नारी की निंदा करने में सर्वथा नहीं है। तत्त्वदृष्टि से वह तत्त्व, दर्शन-भेद से चाहे ब्रह्म हो, प्रकृति हो, शून्य हो, कर्म हो, पंचभूत हो, कुछ भी क्यों न हो नारी और नर का भेद नहीं है। जहाँ निंदा है, वहाँ शरीर की है । जैसे नर-साधकों को नारी के प्रति भोग्य-बुद्धिरूप पाप से बचाने के लिए नारी-शरीर की निंदा शास्त्रों में मिलती है, वैसे ही नारी-साधकों को नर के प्रति भोग्य-बुद्धिरूप पाप से बचाने के लिए नर-शरीर की निंदा प्राप्त होती है।

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