निर्मल मन जन सो मोहि पावा...
Kendra Bharati - केन्द्र भारती|April 2021
अयोध्या में श्रीराम मन्दिर के निर्माण का कार्य शुरू हो गया है। इससे पूरे भारत में अपूर्व आनंद की लहर उठी है। लोग, श्रीराम मन्दिर के निर्माण कार्य में कुछ न कुछ अर्पित करना चाहते हैं और देश में इसके लिए अनगिनत लोगों ने अपने मेहनत की कमाई का कुछ अंश अर्पित किया है। इस कार्य में छोटे आयु के बाल-बलिकाओं और गरीब से गरीब व्यक्ति ने भी आगे बढ़कर योगदान किया है।
लखेश्वर चन्द्रवंशी 'लखेश'

देशवासियों के मन-मन्दिर में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की छवि बसी है। क्योंकि श्रीराम 'धर्म' के धर्म के मूर्त स्वरूप हैं। इसलिए रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि ने कहा, "रामो विग्रहवान् धर्मः। अतः श्रीराम, भारतीय जनमानस में आराध्य देव के रूप में ही नहीं वरन 'धर्म' के रूप में स्थापित हैं, और भारत के प्रत्येक जाति, मत, सम्प्रदाय के लोग श्रीराम की पूजा-आराधना करते हैं। कोई भी घर ऐसा नहीं होगा, जिसमें रामकथा से सम्बंधित किसी न किसी प्रकार का साहित्य न हो क्योंकि भारत की प्रत्येक भाषा में रामकथा पर आधारित साहित्य उपलब्ध हैं।

यह सर्वविदित है कि घोर निराशा के युग में श्रीराम का जन्म हुआ। उनके जन्मकाल में आसुरी शक्तियां चरम पर थी। संसार के समस्त जीव यहाँ तक कि देवतागण भी असुरों के अत्याचारों से आतंकित थे। ऐसी विपद काल में श्रीराम के संघर्षमय और उदात्त जीवन की गाथा को हम बचपन से सुनते आए हैं, और दूरदर्शन में उसकी झलक भी चलचित्र के माध्यम से देश-विदेश के लोगों ने गत वर्ष फिर एकबार देखा। आज 'रामायण' और 'रामचरितमानस' के रूप में महान थाती अपने पास हैं। 'रामचरितमानस' में बालक राम के नामकरण के समय गुरु वशिष्ट, राजा दशरथ से कहते हैं :

जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी।।

सो सुखधाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा।।

आपका यह बालक आनंद का समुद्र और सुख की राशि है। जिस (आनंदसिंधु) के एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं, उनका (आपके सबसे बड़े पुत्र) नाम 'राम' है। यह राम सुख का भवन और सम्पूर्ण लोकों को शान्ति देनेवाला है।

ऐसे भगवान श्रीराम को हमारी बुद्धि और अल्प समझ से हम भला क्या समझ पाएंगे? गोस्वामी तुलसीदास ने ठीक ही लिखा है :-

हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता।।

रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए।।

अर्थात् श्रीहरि अनंत हैं, और इसी प्रकार उनकी कथा भी अनंत है। सब संत लोग उसे बहुत प्रकार से सुनते और सुनाते हैं। श्री रामचन्द्रजी का चरित्र इतना उज्ज्वल है कि करोड़ों कल्पों में भी उन्हें गाया नहीं जा सकता। फिर भी भक्ति और अनुराग में ऐसी शक्ति है कि जिससे प्रभु की कृपा के हम पात्र बन सकते हैं। रामचरितमानस में श्रीराम कहते हैं-

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

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