भरत जी की चित्रकूट यात्रा
Jyotish Sagar|December 2020
सामान्य दिनों की तुलना में 21वें दिन की कथा लम्बी हो चली है, न स्वामी जी थक रहे हैं और न ही श्रोतागण ऊब या थक रहे हैं। वे भी पूर्ण तल्लीनता से कथा रसास्वादन कर रहे हैं।

प्रकरण ही कुछ ऐसा है कि समय का पता नहीं लग रहा है। भरत मिलाप का प्रसंग चल रहा है। भरत जी राम को अयोध्या लौटाने के लिए चित्रकूट में अनेक प्रकार के तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं।

"भरत जी के ग्लानिपूर्ण वचनों को सुनकर वसिष्ठ जी ने उन्हें कई प्रकार से समझाया, फिर श्रीराम ने कहा 'हे तात! तुम अपने हृदय में व्यर्थ ही ग्लानि करते हो, जीव की गति को ईश्वर के अधीन जनों तीनों कालों और तीनों लोकों के सत्पुण्यात्मा पुरुष तुमसे नीचे हैं। माता कैकेयी को वे ही मूर्ख दोष देते हैं, जिन्होंने गुरु और साधुओं की सभा का सेवन नहीं किया है। हे भरत! तुम्हारा नाम स्मरण करते ही सब पाप, प्रपंच और समस्त अमंगलों के समूह मिट जाएँगे तथा इस लोक में सुन्दर यश और परलोक में सुख प्राप्त होगा। गुरु जी ने मुझे आज्ञा दी है, इसलिए अब तुम जो कुछ कहो अवश्य ही मैं वही करना चाहता हूँ। तुम मन को प्रसन्न कर और संकोच को त्यागकर जो कुछ कहो, मैं आज वही करूँ।'

मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजू।

सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।

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