अंगूठा छाप विद्वान!
Akhand Gyan - Hindi|February 2021
जिन उपदेशों को तुम पढ़-गुन कर गर्व करते हो, उनका सार स्वयं श्री भगवान इस युवक की चेतना में उतारते हैं। अहो! गुरु-आज्ञा के पालन से कितना मधुर फल पाया है इसने!

दक्षिण भारत... श्री रंगनाथ मंदिर... मीठी-मीठी घंटियों की धुन! धूप-बाती की भीनी-भीनी सुगंध! मंदिर के परिसर में भक्तों का सतत ताँता लगा हुआ था।

उपासकों के इस रेले-मेले में श्री चरण पड़ेचैतन्य महाप्रभु के। बड़ी निमग्नता थी महाप्रभु की चाल में! आली-निराली सी मलंगता! मानो खजाने खोल कर चल रहे हों! न जाने, अपनी दिव्य मस्ती में किस पर क्या-क्या लुटा देंगे! किसके संस्कारों की गाँठे खोल देंगे; कर्मों के पाश छिन्न-भिन्न कर डालेंगे! किसके संघर्षों, किसकी साधना और तप को फल दे देंगे!

महाप्रभु की रूहानी दृष्टि कृपा-पात्र ढूँढ रही थी। कुछ ही पलों में वह उन्हें मिल गया। महाप्रभु के चरण राह बनाते हुए सीधे उस तक पहुँच गए। शायद वे रंगनाथ आए ही उसके लिए थे।

यह कृपा-पात्र भोंदू सा दिखने वाला एक युवा ब्रह्मचारी था। मंदिर के प्रांगण में एक कोना चुनकर बैठा हुआ था। घुटने मोड़कर, जंघाएँ छाती से सटाए हुए सिकुड़ी सी मुद्रा में। घुटनों के पीछे उसने एक छोटे-से आकार का ग्रंथ छिपाया हुआ था, जिसे वह बड़ी तल्लीनता से घूर रहा था। पर बीच-बीच में कभी तो मुस्कुरा देता, कभी भावभीनी आँखों से अश्रु-मोती लुढ़का देता। बड़ी विचित्र-सी दशा थी उसकी!

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