आओ, संकल्प लें!
Akhand Gyan - Hindi|January 2021
आओ, हम संकल्प लें कि हम सभी श्री गुरु महाराज जी के शिष्य, उनके आदर्शों और आज्ञाओं को भूल से भी नहीं भूलेंगे। हर श्वास में सतर्क रहेंगे। ताकि, किसी भी फिसलन भरे मोड़ पर हम डिगे नहीं।

क्या शिष्य को कभी ऐसा काम करना चाहिए, जिससे...

...गुरु को कष्ट हो?

...वे नाराज़ हो जाएँ?

...रुष्ट होकर उससे दूरी बना लें?

पढ़ने में भी कितना दु:ख देते हैं ये प्रश्न... दिल को कितना आहत करते हैं... अंतरात्मा तक छलनी हो जाती है... है न!

लेकिन फिर भी, बिल्कुल न चाहते हुए भी, कभी-कभी ऐसा क्यों हो जाता है? क्यों हम गुरु-आज्ञाओं को मानने में ढील कर बैठते हैं? क्यों कर्म, संस्कार, आलस्य आदि के वशीभूत होकर कोई न कोई भूल कर बैठते हैं? और फिर वह हो जाता है, जो हमें सपने में भी गवारा नहीं। यानी गुरु से दूरी! उनकी नाराज़गी!

जब ऐसा हो जाए, तो एक शिष्य क्या करे? क्या निराशा या उत्साहहीनता का दामन थाम ले? बिल्कुल नहीं! क्योंकि जीवन के ये सब नकारात्मक पक्ष गुरु को कदापि पसंद नहीं। ऐसा करने से तो दूरी घटने की बजाय और बढ़ जाएगी। इसलिए फिर से उठ खड़ा होना ही सच्चे साधक की पहचान है। शुभ संकल्पों से खुद को ऊर्जायित कर लेना ही विवेक है। इसलिए आइए, आज हम सभी शिष्य कुछ संकल्प लें और उन्हें पूरी ज़िन्दादिली से निभाएँ ताकि गुरु-शिष्य की यह दूरी पूरी तरह खत्म हो जाए और वापस कभी हमारे जीवन में लौटकर न आए!

पहला संकल्प

आदिगुरु शंकराचार्य जी से उनके एक शिष्य ने एक बार कुछ प्रश्न पूछे। इन प्रश्नों के उत्तर सुनने या पढ़ने में जितने संक्षिप्त हैं, अर्थ और मर्म उतने ही गहरे।

शिष्य- भगवन्! किम् उपादेयम्? (ग्रहण करने योग्य क्या है?)

आदिगुरु शंकराचार्य जी- गुरु वचनम्! (गुरु के वचन!)

शिष्य- हेयमपि किम्? (त्यागने योग्य क्या है?)

आदिगुरु शंकराचार्य जी- अकार्यम्। (प्रत्येक वह कार्य जो नहीं करना चाहिए।)

शिष्य- कोऽन्धः? (अंधा कौन है?)

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