बरगद वृक्ष से एक इंटरव्यू!
Akhand Gyan - Hindi|January 2021
मेरे अनेकानेक नाम हैं- अच्युतावास, अवरोहशाखी, अवरोही, कलापी, कलिंग, जटाल, जटी, ध्रुव, न्यग्रोध, नंदी, वट, बड़, बोधि, भूकेश,शृंगी... महात्मा बुद्ध ने मेरी छांव तले आत्म-बोध पाया, इसलिए मुझे 'बोधि वृक्ष' भी नाम दिया गया। मेरी भव्यता के कारण भारतीय मुझे वट वृक्ष या वृक्षराज कहकर बुलाते रहे हैं।

गाँव से बाहर... कुछ कोस दूरी पर... खड़ा पृथ्वी का एक विशालकाय जीवएक बरगद का वृक्ष! बहुत विशाल और विस्तारित आकार! धरा की गहराइयों में उतरी उसकी सशक्त जड़ें! अत्यन्त चौड़ा और सख्त छाल से ढका तना! उसकी शाखाओं का तो क्या कहना! वृहदाकार लम्बी भुजाओं की तरह ऐसे फैली कि हवा में न झूल सकी... मुड़कर धरा में जा गड़ीं, मानो भुजबल से अपने ही भीमकाय तन को सहारा दे रही हों। बड़ी विचित्रता है, इस बरगद के वृक्ष में!

इसी अद्भुतता से आकर्षित हुआ एक रिसर्च स्टूडेंट (शोधकर्ता छात्र)। उसके अनुसंधान का विषय था"Indian Banyan Tree and its socio-religious roles in Scientific dimension' अर्थात् 'भारतीय बरगद का वृक्ष और उसकी सामाजिक-धार्मिक भूमिकाओं का वैज्ञानिक दृष्टि से अवलोकन'। अपने इसी शोध को आयाम देने के लिए वह खिंचा चला आया इस अपूर्व विशालकाय बरगद के पास।

'वाह! क्या वैभव है, मानो वनस्पति जगत का राजा खड़ा हो!'छात्र आह्लादित हो उठा। इसी उमंग में उसने अपने बैग से कैमरा निकाला। तरह-तरह के कोण बनाकर तड़ातड़ बरगद की तस्वीरें खींच लीं। फिर वह घूम-घूम कर उत्सुक दृष्टि से बरगद को निहारता रहा। उसके मन में भाव उठा'हे बरगद! इस सृष्टि में एक छोटी सृष्टि हो तुम! न जाने अपने अंदर कितने रहस्यों को समेटे हुए हो! कौन बताएगा मुझे ये रहस्य? क्या मैं स्वयं समझ पाऊँगा?'

छात्र की इस भोली उत्सुकता ने जैसे वृक्ष को अनुप्राणित कर दिया। वृक्ष की चेतना सजीव हो उठी। मानो प्राकृतिक तरंगों की शैली में उसने छात्र से कहा'मैं स्वयं बताऊँगा तुम्हें अपना भूत, वर्तमान और भविष्य! अपने अंक में समाए सारे रहस्य!' छात्र को यह स्वर स्पष्ट सुनाई दिया। वह खुशी से कई फुट ऊँचा उछल पड़ा। उसने झट से अपनी डायरी और पेन निकाला, साथ ही इतराते हुए कहा'ओके, ओके मिस्टर बरगद! फिर मुझे आपका एक छोटा-सा इंटरव्यू (साक्षात्कार) लेना होगा।'

छात्र- अच्छा, सबसे पहले यह बताइए, आपका नाम 'Banyan Tree' (बैन्यन ट्री) क्यों पड़ा? इसके पीछे कोई कारण है या बस ऐसे ही?

बरगद वृक्ष- हे बालक! मेरे अनेकानेक नाम हैंअच्युतावास, अवरोहशाखी, अवरोही, कलापी, कलिंग, जटाल, जटी, ध्रुव, न्यग्रोध, नंदी, वट, बड़, बोधि, भूकेश, शृंगी...। महात्मा बुद्ध ने मेरी छाँव तले आत्म-बोध पाया, इसलिए मुझे 'बोधि वृक्ष' भी नाम दिया गया। मेरी भव्यता के कारण भारतीय मुझे वट वृक्ष या वृक्षराज कहकर बुलाते रहे हैं। पर जब अंग्रेज़ भारत आए, उन्होंने मुझे 'बैन्यन ट्री' का सम्बोधन दे डाला क्योंकि उन दिनों मेरे छायादार आश्रय तले वैश्य या बनिया वर्ग बैठकर क्रय-विक्रय करता था। बनियों की बनियागिरी या वाणिज्य सम्बन्धी क्रियाओं के कारण ही मेरा नाम अंग्रेजों ने 'बैन्यन ट्री' रख दिया।

छात्र- अच्छा, तो यह बात है। एक बात पूछू, तुम अक्सर आबादी से दूर, गाँव से बाहर, श्मशान घाटों के समीप ऐसे निर्जन स्थलों पर ही क्यों दिखते हो? तुम्हें अन्य वृक्षों की तरह जन-जीवन के उत्सवों में भी शामिल नहीं किया जाता। ऐसा क्यों?

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