दिव्य अनुभूतियाँ-अलौकिक संदेश!
Akhand Gyan - Hindi|January 2021
तेरा मेरा मनुवां कैसे एक होइ रे... मैं कहता हौं आँखन देखी, तू कहता कागद की लेखी।

यह है कबीर जी का एक ज्वलंत उद्घोष! आत्मज्ञानी संत की खरी चुनौती! किसके प्रति? उस समाज के प्रति जो हर वस्तु व परिस्थिति को सिर्फ इन्द्रियों, मन एवं बुद्धि के पैमाने पर तोल कर जीवन जीता है। उसके लिए यथार्थ सत्य की क्या कसौटी है? वही जो स्थूल आँखों या स्थूल यंत्रों से दिखता है! जो स्थूल कानों से सुनता है! जो स्थल त्वचा द्वारा महसूस होता है! जो मन-बुद्धि द्वारा समझा जा सकता है! जन साधारण के लिए बस वही सत्य है।

क्या सच में 'सत्य' की इतनी सीमित परिभाषा हो सकती है? इसी सीमितता को चुनौती देता है, अध्यात्म-वेत्ताओं का वर्ग! तत्त्वज्ञानी गुरुओं का शिष्य-वर्ग! भारत के वे ऋषि-मनीषी, योगी व साधक, जिन्हें इन्द्रियातीत अनुभूतियाँ हुईं। (स्थूल) आँखों के बिना दिखीं। (स्थूल) कानों के बिना सुनीं! जो कुछ देखा व सुना अथवा अनुभव हुआ, वह भावी समय में एक 'सत्य' घटना के रूप में सामने भी आया। साधक वर्ग के लिए ये अंतरानुभूतियाँ अलौकिक चिट्ठियाँ सिद्ध हुईं, जो दैवी संदेश के रूप में उन तक पहुँची और उनका मार्गदर्शन कर संबल देती रहीं। ऐसी ही कुछ इन्द्रियातीत अंतरानुभूतियों के वर्णन यहाँ प्रस्तुत है।

रावण की लंका में अशोक वाटिका में माता सीता को कैद में रखा गया। लंकेश की आज्ञानुसार अत्यंत भयावह राक्षसियाँ विकराल रूप धर कर उन्हें भयभीत करने लगीं। परन्तु उन्हीं राक्षसियों में से एक थी'त्रिजटा'!

उसके विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं“राम चरन रति निपुन बिबेका'त्रिजटा के हृदय में श्रीराम के चरणों के प्रति अटूट प्रीति थी और वह विवेक से संपन्न थी। एक रात्रि उसे एक दिव्य स्वप्न दिखाई दिया, जिसे उसने अन्य समस्त राक्षसियों को सुनाया। वह दिव्य स्वप्न इस प्रकार था-

सपने बानर लंका जारी।

जातुधान सेना सब मारी॥

खर आरूढ़ नगन दससीसा।

मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥

हे राक्षसियों! मैंने स्वप्न में देखा कि एक विराट बंदर ने लंका को भस्मीभूत कर दिया। राक्षसों की सकल सेना काल के गाल में समा गई। रावण नग्नावस्था में है और गधे पर सवार है। उसके शीश मुंडे हुए हैं। बीसों भुजाएँ कटी पड़ी हैं।

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई।

लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥

नगर फिरी रघुबीर दोहाई।

तब प्रभु सीता बोलि पठाई।

आगे मैंने देखा कि रावण यमपुरी की ओर दक्षिण दिशा में जा रहा है। लंका के सिंहासन पर मानो विभीषण जी का अभिषेक हुआ है। लंका में श्रीराम जी का वर्चस्व है, उन्हीं के नाम का डंका बज रहा है। अंततः प्रभु ने माँ सीता को बुलावा भेजा है।

यह दिव्य स्वप्न सुनाकर पूरे आत्मविश्वास से त्रिजटा बोली-

यह सपना मैं कहउँ पुकारी।

होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥

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