ग्रंथों की अनखुली ग्रन्थियाँ!
Akhand Gyan - Hindi|December 2020
आज भगवान श्री कृष्ण के श्रीमुख से निकली दिव्यवाणी 'गीता' की गौरवगाथा का कहीं कोई अंत नहीं है। पर इसे जग के समक्ष उजागर करने का श्रेय यदि किसी को जाता है, तो वे हैं आदिगुरु शंकराचार्य जी।

वर्तमान में, पावन-पुनीत ग्रंथ रामायण के विश्व भर की विभिन्न भाषाओं में लगभग 300 संस्करण पाए जाते हैं। ऐसे में, यदि हम आपसे पूछे कि भगवान श्रीराम के चरित्र पर लिखा हुआ इनमें से प्राचीनतम ग्रंथ कौन सा है? तो प्रत्युत्तर में समवेत स्वर में 'वाल्मीकि रामायण' ही मुखरित होगा। कारण कि त्रेतायुग में वाल्मीकि जी प्रभु श्री राम के ही समकालीन थे। कहा जाता है कि माँ सीता के उनके आश्रम में आने से पूर्व ही वे रामायण की रचना कर चुके थे।

पर आज हम आपके समक्ष एक ऐसा तथ्य रखेंगे, जिससे शायद मुट्ठी भर लोग भी परिचित नहीं हैं। वह यह कि रामायण काल में आदिकाव्य कहे जाने वाला ग्रंथ 'वाल्मीकि रामायण' ही नहीं, श्री राम जी के चरित्र पर एक और ग्रंथ लिखा गया था। उसका था'हनुमद् रामायण' और इसके रचियता थेपरम रामभक्त 'हनुमान'। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसारराम-रावण युद्ध के समाप्त होने के बाद हनुमान जी के भीतर का भक्त-कवि जाग उठा। वे अपने आराध्य प्रभु श्री राम की महिमा गुनने के लिए भाव-विभोर हो उठे। इसके लिए उन्होंने हिमालय की एकांत वादियों का चयन किया, ताकि बिना किसी की रोक-टोक व दखलअंदाजी के वे भक्ति-प्रवाह में डूब सकें। वहाँ पहुँचकर उन्होंने प्रभु राम की गुणगाथा अपने नखों से पर्वतों पर अंकित कर डाली, जिसे 'हनुमद् रामायण' कहा गया।

सर्वप्रथम जब वाल्मीकि जी ने इस कृति को देखा, तो वे हतप्रभ रह गए। यह श्री राम के प्रति हनुमान जी की अनन्य प्रीति, भक्त परायणता की एक अद्भुत मिसाल थी। वाल्मीकि जी को अहसास हुआ कि इस काव्य के आगे उनकी रचना कहीं स्थान नहीं रखती। 'हनुमद् रामायण' को पढ़ने के बाद जो लोग आज तक हनुमान जी के शौर्य, बल, पराक्रम, विवेक और चातुर्य मात्र से परिचित थे, वे अब उनके काव्य कौशल का भी मुक्त कंठ से गुणगान करने लगेंगे। वाल्मीकि जी को 'हनुमद् रामायण' के समक्ष 'वाल्मीकि रामायण' बहुत बौनी प्रतीत होने लगी। अतः उनके चेहरे पर मायूसी छा गई। हनुमान जी को ज्यों ही इस बात की भनक लगी, उन्होंने द्रुत गति से वे सभी पहाड़ उखाड़े जिन पर उनकी स्वरचित रामायण अंकित थी और उन्हें निकटतम सागर की लहरों में समर्पित कर दिया। यह देखकर वाल्मीकि जी अवाक् हो बोले'भक्त हनुमान! मेरी निराशा का मन्तव्य यह कदापि नहीं था कि आप अपनी इस अनमोल कृति को ऐसे नष्ट कर दें।'

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