गुरु से क्या और किस प्रकार पाएँ ?
Akhand Gyan - Hindi|November 2020
साईं बाबा की बगिया... सबूरी से महक रही थी। शिरडी में भक्ति और ज्ञान के कमल लेकर बाबा बैठे थे। जो द्वारे आता, उसी की झोली में इन अलौकिक फूलों की सौगात डाल देते। इन्हीं दिनों नाना साहिब चंदोरकर का शिरडी में आना हुआ। नाना साहिब वेदांत के धुरंधरों में से एक माने जाते थे।

जब विद्वता का इतना भारी टोकरा सिर पर रखा हो, तो अक्सर गर्दन अकड़ ही जाती है, चाल-ढाल भी बदल जाती है। नाना साहिब भी इसी अकड़ी और बिगड़ी हुई चाल में चलते हुए साईं बाबा की द्वारिकामाई पहुँचे।

संध्या बेला थी। द्वारिकामाई में संगत की ज्यादा चहल-पहल भी न थी। एक सेवक से पूछकर नाना साहिब सीधे उस आंगन में पहुँचे, जहाँ बाबा एक बड़ी-सी शिला पर विराजमान थे। नाना ने आगे बढ़कर बाबा को प्रणाम किया।

'आपकी बहुत शोहरत सुनी है, साईं। आपकी खुशबू से मतवाला होकर ही दास श्री चरणों में हाजिरी लगाने आया है।'मीठे-मधुर शब्दों की चाशनी पकाते हुए नाना साहिब बाबा के चरणों में बैठ गए। फिर बड़े ही औपचारिक अंदाज़ में चरणों को परसने लगे। जनाब के मन में गीता के चौथे अध्याय का एक श्लोक हावी था "तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया... गुरु के पास जाकर प्रणाम करो, सेवा करो, प्रश्न करो...' सो, इसी श्लोक के आधार पर नाना साहिब किसी सधे हुए अदाकार की तरह आचरण कर रहे थे। बेचारे नाना नहीं जानते थे कि उनके सामने जो बैठा है, वह किसी फिल्म का डायरेक्टर नहीं, पूरी दुनिया का वली है! उसकी पारदर्शी आँखें जानती हैं कि कौन अभिनय' कर रहा है, कौन 'अभिनंदन'!

इसलिए अपने सामने बैठे इस आलिम फाजिल कलाकार को देखकर साईं मुस्कुरा दिए। फिर मानो फुग्गे (गुब्बारे) में और फूंक भरते हुए साईं बोले'ख्याति तो हमने भी तेरी बहुत सुनी है। सुना है कि तू वेद-शेद का बड़ा जानकार है।' नाना साहिब गद्गद भाव से हँस पड़े। अहम् को ऐसा फुलाव मिला कि साईं के वचनों का ही संशोधन कर बैठे'बाबा, केवल वेद नहीं, उपनिषद्, गीता सहित सम्पूर्ण वेदांत का भी दास ने अध्ययन किया है।' ऐसा कहते हुए नाना की वाणी में तो विनम्रता थी, लेकिन मन में व्यंग्य तुनक उठा था"भला ये सीधे-साधे फक्कड़ बाबा क्या समझेंगे, वेद और वेदांत का अंतर? इन्हें तो संस्कृत किस खेत की चिड़िया हैशायद यह भी नहीं पता होगा!'

अंतर्यामी साईं भी गुब्बारे से खेलने का खूब मज़ा ले रहे थे। इसलिए भोले-भाव से बोले'अच्छा, अच्छा, तो तूने गीता भी पढ़ी है?'

नाना (खिसियानी सी हँसी हँसता हुआ)- जी, आपके आशीर्वाद से दास गीता पर एक सर्वविख्यात विस्तृत टीका भी लिख चुका है... और जी, विशिष्ट सभाओं में गीता पर मार्मिक व्याख्यान तो बांचता ही रहता है।

साईं- अरे! तू तो बहु.....त बड़ा आदमी है रे! अच्छा, चल गीता का कोई एक सलोक (श्लोक) ही सुना दे।

अब तो नाना साहिब इठला ही उठे। दो मिनट पहले बुद्धि पर जो श्लोक हावी था, वही फटाफट सुना डाला-

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥

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