'स्थान' नहीं, 'संघर्ष' मायने रखता है!
Akhand Gyan - Hindi|November 2020
'स्थान' नहीं, आंतरिक संघर्ष' मायने रखता है। आबोहवा' नहीं, गुरु की आज्ञा' में शक्ति होती है, जो तुम्हें आध्यात्मिक सफर पर कहीं का कहीं पहुंचा सकती है... और गुरुदेव शिष्य की सीरत, प्रवृत्तियों के हिसाब से ही आज्ञा देते हैं। हिमालय की एकांत और शीतल वादियाँ तुम्हें वो नहीं दे सकतीं, जो गुरु के देश में बिताया एक पल तुम्हें देता है। गुरु-दरबार की घुटी-घुटी हवा में भी खुशबू' है! वहाँ के शोर में भी अनहद नाद' है! और वहाँ की भागदौड़ भी उत्थान की सीढ़ियाँ चढ़ने जैसा है।

वाह! क्या ठंडी, ताजी हवा होगी वहाँ! शुद्ध, बेमिलावट साँसे ले 'पाऊँगा, पहाड़ की उन चोटियों पर! अहा!... शहर के इस भीड़-भड़क्के से दूर... ज़िन्दगी की मारा-मारी, आपाधापी से अलग! एकांत, नीरव एकांत... जहाँ होगी केवल शांति... शांति... शांति! ऐसे में तो प्राणायाम भी खूब सधेगा। ध्यान भी अच्छा लगेगा। फिर तो सुपर स्पीड से आध्यात्मिक उन्नति होगी। वाह! पर्वत की ऊँची चोटियों पर आंतरिक ऊँचाई!'मुकुंद विचारों के झूले में झूल रहा था'यहाँ आश्रम में तो संगत का ऐसा ताँता, इतना आना-जाना लगा रहता है कि साँस भी घुट-घुट कर आती है। ऊपर से ज़िम्मेदारियों की भागदौड़... रात होते-होते तो कमर इतनी टूट जाती है कि सीधे बिछौने पर लुढ़क जाती है। वहाँ पहाड़ों पर तो बस रात-दिन एक ही काम होगाध्यान! ध्यान! ध्यान! सच! मुझे जाना ही होगा... आज शाम को ही गुरु जी से आज्ञा ले लूँगा।'

मुकुंद श्री युक्तेश्वर गिरि जी महाराज के परम शिष्यों में से एक था और उनके आश्रम में ही रहा करता था। उसमें ध्यान में गहरा उतरने की अकूत ललक थी। इसी के चलते वह पहाड़ों पर जाने का फैसला ले बैठा।

संध्या कीर्तन के बाद... मुकुंद ने सीधे युक्तेश्वर जी के चरणों में हाज़िरी लगाई। हाथ जोड़कर याचना की'गुरुदेव, मैं हिमालय की पर्वत-शृंखलाओं में अखण्ड साधना करना चाहता हूँ। मुझे लगता है कि मैं पहाड़ों के एकांत में ही ईश्वर के साथ योग कर सकूँगा। आप अनुमति दें, तो मैं चला जाऊँ।' मुकुंद ने बड़ी आशा के साथ अपनी इच्छा रखी थी। उसकी आँखों और वाणी में भरपूर आग्रह भी था। पर यह क्या! गिरि महाराज जी ने तो उम्मीद से अलग ही प्रतिक्रिया की। दो टूक बोले'मुकुंद, अगर पहाड़ों पर जाकर ही ईश्वर से योग सधता, तो सारी पहाड़ी जातियाँ पूर्ण आत्मज्ञानी होतीं। पर ऐसा नहीं है। अरे, जड़ पर्वतों की शरण में जाने से लाख गुना अच्छा किसी चैतन्य ब्रह्मज्ञानी की छत्रछाया में रहकर साधना करना है।'

शायद ही इससे स्पष्ट संदेश एक शिष्य को दिया जा सकता था। गुरुदेव कहना चाह रहे थे कि तेरी ठोर पर्वत नहीं, मैं हूँ। और नसीब से मैं जीते-जागते रूप में तेरे पास ही हूँ। फिर क्यों तू अपने इस नसीब को छोड़कर पत्थरों में उसे ढूँढने निकलना चाहता है? पर न जाने मुकुंद पर कैसी धुन सवार थी? वह समझ कर भी गुरु जी की बात समझ नहीं पाया। उसने अपनी प्रार्थना दूसरी बार दोहराई‘पर गुरुदेव, यहाँ के शोरगुल में, भागमभाग में भी तो ध्यान नहीं लगता।'

गुरुदेव- मुकुंद, गोल-गोल घूमते और शोर करते रहट में ही तो घोड़ा पानी पीता है।

मुकुंद (बेसब्री से)- गुरुवर, एक बार एकांत में ध्यान लगाना सीख जाऊँगा, तो फिर शोरगुल में भी लगा लिया करूँगा... कृपया, जाने दीजिए न... जल्द ही लौट आऊँगा।

गुरुदेव मौन हो गए। क्योंकि गुरु जानते हैं कि शिष्य की मानसिक स्थिति क्या है और शब्द उस पर कितना असर डालेंगे। लेकिन शिष्य को समझ जाना चाहिए कि गुरुदेव का मौन शब्दों की नसीहत से भी ज्यादा ताकत रखता है। उसमें 'सावधान, सावधान!' का बिगुल बजता है। पर मुकुंद के कानों पर अपनी आकांक्षा के ऐसे पर्दे पड़े हुए थे कि वह इस बिगुल को सुनकर भी न सुन पाया। उसने गुरुदेव के मौन को उनकी 'हाँ' (स्वीकृति) मान लिया।

गुरुदेव का मौन शब्दों की नसीहत से भी ज्यादा ताकत रखता है। उसमें 'सावधान', 'सावधान!' का बिगुल बजता है।

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