संकट ही नहीं हर्ष भी देकर गया बीता साल
Uday India Hindi|January 09, 2022
इक्कीसवीं सदी के इक्कीसवें वर्ष को अलविदा कहते हुए नए वर्ष का स्वागत हम इस सोच और संकल्प के साथ करें कि हमें कुछ नया करना है, नया बनना है, नये पदचिह्न स्थापित करने हैं। बीते वर्ष की कोरोना महामारी के अलावा मौसमी आपदाओं, आर्थिक असंतुलन, राजनीतिक उठापटक, बर्फीले तूफान, समुद्री चक्रवात, बाढ़ और जंगलों के राख होने एवं धरती के तापमान के बढ़ने की पीड़ाओं, दर्द एवं प्रकोप पर नजर रखते हुए उन पर नियंत्रण पाने का संकल्प लेना है। हमें यह संकल्प करना और शपथ लेनी है कि आने वाले वर्ष में हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो हमारे उद्देश्यों, उम्मीदों, उमंगों और आदर्शों पर प्रश्नचिह्न लगा दे। कोरोना महामारी की तीसरी लहर यानी ओमीक्रोन की आहट के बीच हमें नये साल में अपनी जीवनशैली को नया रंग और आकार देना है।
ललित गर्ग

कोरोना महामारी ने हमारे जीने के तौरतरीकों को अस्तव्यस्त कर दिया है। नववर्ष का स्वागत करते हुए हमारे द्वारा यह कामना करना अस्वाभाविक नहीं थी कि हमारे नष्ट हो गये आदर्श एवं संतुलित जीवन के गौरव को हम फिर से प्राप्त करेंगे और फिर एक बार हमारी जीवन-शैली में पूर्ण भारतीयता का सामंजस्य एवं संतुलन स्थापित होगा। किंतु कोरोना के जटिल दौर के बीतने एवं नये साल की अगवानी पर हालात का जायजा लें, हमारे राष्ट्रीय, सामाजिक, पारिवारिक और वैयक्तिक जीवन में जीवन-मूल्य, आर्थिक स्थितियां, व्यापार, रोजगार एवं कार्यक्षमताएं खंड-खंड दृष्टिगोचर होते हैं। कोरोना ने इस दौरान समूची इंसानियत को घुटने के बल बैठने पर मजबूर कर दिया। पूरी दुनिया में अब तक 27 करोड़, 65 लाख से अधिक लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं। इनमें से करीब 54 लाख को अपनी जान गंवानी पड़ी। भारत में भी यह आंकड़ा पांच लाख की ओर बढ़ चला है। भारत इस त्रासदी का शिकार होने वाले शीर्ष पांच देशों में गिना जाता है। कोरोना से न केवल लोगों की जान गई, बल्कि बड़ी संख्या में लोग बदहाली के शिकार भी हुए। हालांकि, इस दौरान सुकून की बात यह रही कि केंद्र और राज्य सरकारों ने महामारी से लड़ने में कोई कोताही नहीं बरती। भारत में बने दो टीकों ने लोगों को इस प्राणलेवा आपदा से निपटने का सामर्थ्य प्रदान किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संकल्प के कारण 16 जनवरी से अब तक एक अरब, 40 करोड़ से अधिक खुराक दी जा चुकी हैं। यही नहीं, आर्थिक विकास दर वापस लौटाने के लिए भी भगीरथी प्रयास हुए, पर महामारी के घाव को भरने में एवं ओमीक्रोन को परास्त करने में काफी समय लगेगा।

बीते वर्ष में आर्थिक असंतुलन के कड़वे चूंट पीने को मजबूर होना पड़ा है। इस दौरान भारत में आर्थिक विषमता की खाई और चौड़ी होती चली गई। भारत में देश की कुल आमदनी का 57 फीसदी हिस्सा शीर्ष 10 फीसदी लोगों की जेबों में गया। आधी आबादी के हिस्से में सिर्फ 13 प्रतिशत कमाई आई। गरीबी की रेखा को मिटाने के जो प्रयत्न पूर्व में हुए, वे पुनः विपन्नता की अंधी खोह में समा गए हैं। दुनिया के गरीब मुल्कों को बहुत तेजी से आत्मनिर्भरता की लड़ाई लड़नी होगी। आने वाले साल यकीनी तौर आर्थिक राष्ट्रवाद के होने वाले हैं।

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