सोनिया परिवार के नागपाश से कांग्रेस को मुक्त करवाने का एक और प्रयास
Uday India Hindi|December 12, 2021
बहुत से कांग्रेसी ऐसे हैं जो सचमुच विचारधारा के कारण कांग्रेस के भीतर हैं। यह विचारधारा कितनी प्रासंगिक है और कितनी नहीं यह विवाद का विषय हो सकता है। ऐसे कांग्रेसी अपनी वैचारिक आस्था के कारण पार्टी छोड़ कर दूसरी राजनीतिक दलों में भी नहीं जा सकते हैं। लेकिन सोनिया परिवार के व्यक्तिगत हितों के लिए सम्पूर्ण पार्टी के दुरुपयोग को देखते हुए, उनके लिए पार्टी के भीतर रहना भी कठिन होता जा रहा था। ममता बनर्जी ने इस प्रकार के कांग्रेस-जनों के लिए अपना दरवाजा यह कह कर खोल दिया है कि तृणमूल कांग्रेस ही वास्तव में कांग्रेस की विरासत की उत्तराधिकारी है।
प्रो. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

कांग्रेस को सोनिया परिवार के नागपाश से मुक्त करवाने का एक और प्रयास शुरु किया है। इस बार यह प्रयास कालीधाम बंगाल से शुरु हुआ है। ममता बनर्जी इसकी अगुआ बनी हैं। वे अपनी राजनीति का दायरा बढ़ाना चाहती हैं। वे स्वयं हैंवे को क्षेत्रीय दल के बन्धन से निकाल कर अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित करना चाहती हैं। वैसे भी ममता बनर्जी का स्वभाव और उसकी दृष्टि अखिल भारतीय ही रही है। वे संकुचित क्षेत्रीयता से मुक्त रही हैं। लेकिन तृणमूल के साथ वे अखिल भारतीय राजनीति नहीं कर सकतीं। ममता ने 1997 में सोनिया कांग्रेस को अलविदा कह दी थी। उसका मूल कारण कांग्रेस की राजनीति में ही ढूंढना पड़ेगा। दरअसल ज्यों-ज्यों सोनिया परिवार का कांग्रेस पर शिकंजा कसता गया त्यों-त्यों पार्टी की दृष्टि, स्वभाव और राजनीति अखिल भारतीय न रह कर परिवार के हितों तक ही सीमित होने लगी थी। इससे कांग्रेस के भीतर ही छटपटाहट बढ़ने लगी। बहुत से कांग्रेसी क्षत्रपों को भी लगने लगा कि कांग्रेस अब देश के हितों का ध्यान न रख कर केवल सोनिया परिवार के हितों की रक्षा करने वाला एक दवाब समूह बनता जा रहा है। इसी के परिणामस्वरूप कांग्रेस से दूर होने की प्रक्रिया शुरु हुई। उधर सोनिया परिवार और भी तेजी से कांग्रेस को अपने परिवार के हितों की रक्षा के लिए कवच की तरह इस्तेमाल करने लगा। स्थितियां यहां तक पहुंच गईं कि सोनिया गांधी भारत की प्रधानमंत्री भी बन सकती हैं, यह खतरा भी स्पष्ट दिखाई देने लगा था। उस समय शरद पवार ने मेघालय के पूर्ण संगमा को लेकर मोर्चा खोला था कि वे सोनिया गांधी को भारत का प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे।

खैर अनेकानेक कारणों से सोनिया परिवार प्रधानमंत्री के पद पर तो कब्जा नहीं कर सका लेकिन कम्युनिस्टों की रणनीति के चलते सोनिया गांधी के नेतृत्व में अनेक राजनीतिक दलों का एक मोर्चा यूपीए के नाम से जरुर गठित हो गया, जिसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बने। उस समय कुछ काल के लिए ममता बनर्जी और शरद पवार भी अपनेअपने तात्कालिक राजनीतिक हितों के लिए यूपीए में रहे। लेकिन जब यह स्पष्ट होने लगा कि मनमोहन सिंह तो नाम के प्रधानमंत्री हैं और भारत की सत्ता पर परोक्ष रूप से नियंत्रण सोनिया परिवार का ही हो गया था तो यूपीए के घटकों में भी बेचैनी बढ़नी ही थी। कुछ घटक दल उससे छिटक भी गए। सोनिया परिवार द्वारा परोक्ष रूप से सत्ता संभाल लेने और उसकी गतिविधियों से आम भारतीयों में भी बेचैनी बढ़ने लगी। हद तो तब हो गई जब यूपीए सरकार ने उच्चतम न्यायालय में शपथ पत्र दाखिल कर दिया कि राम एक काल्पनिक व्यक्ति थे, असल में उनका कोई अस्तित्व नहीं है। तब यह स्पष्ट होने लगा था कि सोनिया परिवार अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों के लिए ही भारत की सत्ता का इस्तेमाल नहीं कर रहा है बल्कि वह भारत के सांस्कृतिक प्रतीकों को भी नष्ट करना चाहता है। सोनिया परिवार के इर्द-गिर्द जिन लोगों का घेरा था उससे यह शक और भी गहराने लगा था।

उसका परिणाम 2014 के लोकसभा चुनाव में स्पष्ट दिखाई देने लगा था। सोनिया परिवार के नेतृत्व में कांग्रेस पूरे देश में केवल 44 सीटें जीत सकीं।

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