चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीड़....
Uday India Hindi|November 07, 2021
चित्रकूट धाम कर्वी से लगभग 3 किमी. दूर दक्षिण की ओर गणेशबाग में स्थित है। यह स्थान श्री वाजीराव पेशवा के शासन काल में निर्मित हुआ था, गणेशबाग की स्थापत्य कला अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि पेशवा काल में स्थापत्य कला अपनी चरम सीमा पर थी। पंच मंजिलें के समूह को पंचायतन कहते है। इस पंच मंजिले मन्दिर के शिखर पर काम कला के खजुराहो शैली पर आधरित विस्तृत चित्राकंन है। कुछ स्वतन्त्र मैथुन मुद्रा में हैं, तथा कुछ पुराणों एवं रामायण पर आधारित है। यहां काम, योग तथा भक्ति का अद्भुत सामंजस्य देखने को मिलता है।
सुरेन्द्र अग्निहोत्री

चित्रकूट मंदाकिनी नदी के किनारे पर बसा भारत के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में एक है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 38.2 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला शांत और सुन्दर चित्रकूट प्रकृति और ईश्वर की अनुपम देन है। चित्रकूट! एक ऐसी अनपुम तपस्थली जहां की मिट्टी, पहाडों, वनों और झरनों की खुशबू देश विदेश के योगियों, ऋषियों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती रही है । विचित्रताओं के परिवेश में पल्लवित होती धरा का नाम अतीत से ही चित्रकूट ही है। बुन्देलखन्ड की वीर धरा पर आने वाला सैलानी यहां के अद्भुत नयनाभिराम दृश्यों को देखकर आनंदित हो उठता है। विचित्रताओं और विभिन्नताओं वाले इस क्षेत्र पर कही कल-कल करती मंदाकिनी का सुन्दर जल है तो कही विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं का उन्मुक्त यौवन विखेरती पहाड़ियां हैं तो कही सुन्दर गुफाओं में भित्ति चित्र हैं। विध्य पर्वत में फैले विशालकाय वन आगन्तुक पर्यटक का मन मोह लेता है । धर्म अध्यात्म का संदेश सुनाता चित्रकूट देश में मौजूद अन्य पर्यटन केन्द्रो से सबसे अलग है। इस भूमि जब तक प्रभु श्री राम रहे हर कंटक से मुक्त रहे। चित्रकूट आने वाले के मूल में धार्मिकता के दर्शन होते है। प्रकृति की अनमोल धरोहरों से आनंदित होता व्यक्ति जब सुबह उठते ही साथ बम-बम भोले और जय श्रीराम के उदघोष घंटा घटियालों के साथ सुनता है तो वह रोमांचित होकर धर्म की इस नगरी में आकर अपने आपको पुण्य का सबसे बड़ा भागी मानता है।

रामघाट

मन्दाकिनी के पश्चिम तट पर बने हुए घाटों के मध्य में स्थित घाट को रामघाट कहते हैं। इसका यह नाम पूज्यपाद गोस्वामी जी द्वारा भगवान राम के मस्तक में चन्दन लगाने की घटना से सम्बद्ध है। पूज्यपाद गोस्वामी जी को श्रीराम के दर्शन श्री हनुमान जी की प्रेरणा से इसी घाट में हुये थे। जिसका उल्लेख हनुमान जी के द्वारा कहे हुए दोहे से स्पष्ट होता है।

चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीड़।

तुलसीदास चन्दन घिसै, तिलक करें रघुवीर।।

तोतामुखी श्री हनुमान जी द्वारा इस दोहे का निर्देश किये जाने से यहां पर एक तोतामुखी हनुमान जी की प्रतिमा आज भी है।

दूसरी प्रसिद्धि श्री रामचरित मानस के अनुसार श्री राम का यह निर्देश कि-

रघुवर कहो लखन भल घाट।

करहु कतहु अब टाहर टाटु।।

ये भी रामघाट की ओर संकेत कर रहा है। इस घाट के पश्चिम की ओर यज्ञवेदी एवं पर्ण कुटी नामक स्थान आज भी स्थित है। जो कि भगवान राम के निवास की स्मृति को आज भी ताजी बना रही हैं।

गणेश बाग

चित्रकूट धाम कर्वी से लगभग 3 किमी. दूर दक्षिण की ओर गणेशबाग स्थित है। यह स्थान श्री वाजीराव पेशवा के शासन काल निर्मित हुआ था, गणेशबाग की स्थापत्य कला अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि पेशवा काल में स्थापत्य कला अपनी चरम सीमा पर थी। पंच मंजिलें के समूह को पंचायतन कहते है। इस पंच मंजिले मन्दिर के शिखर पर काम कला के खजुराहो शैली पर आधरित विस्तृत चित्राकंन है। कुछ स्वतन्त्र मैथुन मुद्रा में हैं, तथा कुछ पुराणों एवं रामायण पर आधारित हैं। यहां काम, योग तथा भक्ति का अद्भुत सामाजस्य देखने को मिलता है।

मन्दिर के ठीक सामने एक सरोवर है, जिसके ऊपर मन्दिर की ओर स्नान के लिए एक हौज है, जिसमें दो छिद्रों से पानी आता है, मन्दिर में फानूस में लगे हुए लोहे के हुक आज भी कला-कृति एवं साज-सजावट की दस्तान बताते हैं। मन्दिर से कुछ हटकर पंचखंड की वावली है, जिसके चार खण्ड भूमि-गत हैं। ग्रीष्म ऋतु में जलस्तर कम होने पर तीन खंडों के लिए रास्ता जाता है। 'कर्वी' पेशवा कालीन राजमहल (वर्तमान कोतवाली) से गणेश बाग तक गुप्त रास्ता है, जो पेशवाओं के पारिवारिक सदस्यों के आने-जाने के लिए प्रयुक्त किया जाता था। यदि इसे छोटा खजुराहो कहा जाय तो अतिश्योक्ति न होगी।

कोटि तीर्थ

यह स्थान रामघाट से पूर्व 6 मील दूर सड़क पर्वत पर स्थित है। यहां पर एक कोटि मुनीश्वर श्रीराम जी के दर्शनार्थ तप करते थे, उनके ऊपर प्रसन्न होकर श्रीराम जी ने सबको एक साथ दर्शन दिये। यहां पर एक शिवजी का मन्दिर है। इस स्थल को सिद्धश्रम कहते हैं। अग्नि, वरूण, सूर्य, चन्द्र, वायु आदि अनेक तीर्थ के होने से इसे कोटि तीर्थ कहते हैं।

हनुमान धारा

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