खेल नीति से दिखने लगी मैदान में चमक
Uday India Hindi|August 22, 2021
ओलंपिक के सवा सौ साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब भारत ने सात पदक जीते हैं। एक अरब 40 करोड़ की जनसंख्या और दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए यह उपलब्धि कुछ खास नहीं है। लेकिन अतीत की ओर झांके तो यह उपलब्धि भी कम नहीं है। इसके पहले भारत ने लंदन ओलंपिक में छह पदक जीते थे।
उमेश चतुर्वेदी

इस बार भाला फेंक में नीरज चोपड़ा को स्वर्ण मिला है, जबकि भारोत्तोलन में मीरा बाई चानू और कुश्ती में रवि दहिया रजत पदक जीतकर इतिहास रचा। भारत के खाते में चार कांस्य पदक आए, जिनमें बैंडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु, बॉक्सिंग में लवलीना बोर्गोहेन, कुश्ती में स्टार पहलवान बजरंग पूनिया और भारतीय हाकी टीम शामिल रही। इसके अलावा पहलवान सतीश पूनिया और महिला हॉकी टीम के साथ ही गोल्फर अदिति अशोक ने भले ही पदक नहीं जीते, लेकिन उन्होंने देश का दिल जीत लिया। ये चौथे स्थान पर रहे।

बेशक दुनिया परमाणु हथियारों से आगे के दौर में पहुंच गई है। कई देश अंतरिक्ष तक में अपनी कामयाबी का झंडा गाड़ चुके हैं। आज के दौर में आर्थिक महाशक्ति बनकर, सैनिक ताकत बढ़ाकर और अंतरिक्ष में कामयाबी के झंडे फहराकर ही ताकत और प्रतिष्ठा नहीं हासिल की जा रही, बल्कि खेलों की दुनिया में सफलता हासिल करके वैश्विक राजनीति में अपनी ताकत का लोहा मनवाया जा रहा है। ऐसे माहौल में भारत का खेलों की दुनिया में ऐसा प्रदर्शन बहुत संतोष जनक नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिस तरह टोकियो ओलंपिक में खिलाड़ियों ने अपना दमखम दिखाया और पदकों पर निशाना साधा, उससे संकेत साफ हैं। आने वाले दिनों में देश खेलों के मोर्चे पर भी अपना वैश्विक वर्चस्व दिखाने में कामयाब रहेगा। इसकी बड़ी वजह केंद्र की मोदी सरकार की दीर्घकालिक योजनाएं मानी जा रही है।

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