समय है टॉप्स पे जाने का
Uday India Hindi|August 22, 2021
हर चार साल बाद जब ओलंपिक का मौसम आता है तो ये सवाल अपने आप खड़ा हो जाता है कि हममें वह काबिलियत क्यों नहीं।
नीलाम कृष्ण

ये सवाल हमें लगातार शर्मिंदा करता है कि हमारे कुल घरेलू उत्पाद की दर जहां दुनिया के समृद्ध देशों को भी पीछे छोड़ रही है, वहीं हम अंतर्राष्ट्रीय खेलों के पहले पायदान पर भी नहीं पहुंच पाए। आरोप-प्रत्यारोप के इस चक्र में शक की सुई घूम कर जाती है, खेल अधिकारियों की ओर, जिन्होंने खेल का स्तर सुधारने की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। खेल संगठनों में पनपते भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और निहित स्वार्थ के कारण एक अरब से ज्यादा की हमारी आबादी मात्र दर्शक बनी रह गई। आंकड़ों को देखा जाए, तो दुनियाभर में, खेलों की लोकप्रियता बढ़ाने में हमारा सबसे बड़ा योगदान है। लेकिन भारत में कितने खिलाड़ी हैं और कितने दर्शक, ये अंतराल भी दुनिया के किसी और देश में नहीं होगा।

हर 4 साल बाद जब ओलंपिक खेलों का मौसम आता है, और बातें छिड़ती हैं कि कौन सा देश कितने पदक ले जाएगा, तब भी यही सवाल हमारे सामने फिर आ खड़ा होता है कि हममें वह काबिलियत क्यों नहीं। सौभाग्य से हमें अभिनव बिंद्रा मिल गए, जिनकी वजह से ओलंपिक में स्वर्ण पदक न जीत पाने की शर्मिंदगी कम हुई, लेकिन खेलों के औसत स्तर को आज भी न छू पाने का मलाल तो अपनी जगह रहेगा ही। इस सवाल का जवाब काफी जटिल है, और यहां इसकी परतों को खोलने की कोशिश करना भी बेकार होगा। ऐसा नहीं है कि देश में खेल प्रतिभाओं की कमी है। कमी है तो उन्हें तलाशने-तराशने वाले एक भरोसेमंद तंत्र की। जिन खेल संघों पर खिलाड़ियों की खोज करने और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धाओं लायक तैयार करने की जिम्मेदारी है वे नाकाम हैं। खेलों में भारत की दयनीय स्थिति इसलिए और अधिक निराश करने वाली है, क्योंकि भारत युवाओं का देश है और इस तथ्य का राजनेता एक बड़े अवसर के रूप में जमकर उल्लेख भी करते हैं। यह विंडबना ही है कि इस बड़ी युवा शक्ति को सही दिशा देने की ओर किसी का ध्यान नहीं है। युवाओं के अपने विकास और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका सुनिश्चित करने की दृष्टि से अभी बहुत काम होना बाकी है।

आज के समय में खेल देशों की प्रतिष्ठा और वहां के निवासियों की तरक्की आंकने की एक कसौटी भी बन चुके हैं। इस लिहाज से भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत पिछड़ा हुआ है। एक-दो खेलों को छोड़ दिया जाए तो यह नहीं कहा जा सकता कि देश में खेलों के प्रति वैसा उत्साह है जैसा होना चाहिए। भारत ने अपनी मेधाशक्ति के बल पर अंतरिक्ष विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी के साथ-साथ कुछ अन्य क्षेत्रों में अपनी सफलता के झंडे गाड़े हैं, लेकिन यही बात खेलों के मामले में नहीं कही जा सकती। इसका कारण यह है कि जैसे मेधावी बच्चों की पूछ-परख होती है वैसी खेलों में दक्ष बच्चों की नहीं होती, जबकि ऐसा अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। इससे ही विशाल युवा शक्ति को सही दिशा मिलेगी।

देश को TOP पर लाने का मॉडल

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