हिंदी चैनलों की भक्ति गायब जन मुद्दे
Sarita|October First 2021
सरकार को चारों तरफ से घेरने की अग्र जिम्मेदारी जिन मीडिया चैनलों पर थी, वे पहरेदार बन उस का बचाव करने में जुटे हैं. टीवी न्यूज चैनलों द्वारा किसानों की समस्याएं, बेरोजगारी, महंगाई जैसी दिक्कतों को छिपाने के भरसक प्रयास और गैरजरूरी मुद्दे उठाए जाना एक सोचेसमझे षड्यंत्र का हिस्सा है. अधिकांश चैनलों द्वारा असल मुद्दों को धूल की तरह कारपेट के नीचे छिपाया जा रहा है.
सरिता टीम

आज पूरे विश्व में हिटलर और उस की दहशत के बारे में कौन नहीं जानता. ऐसा क्रूर शासक जिस के बारे में प्रचलित किस्सेकहानियां आज भी दिल दहला देती हैं, सोचने को मजबूर कर देती हैं कि क्या लोकतंत्र के दमन का ऐसा भी कोई शासन चलाया जा सकता था? इस प्रश्न का जवाब यदि हिटलर युग में ढूंढा जाता तो शायद न मिलता लेकिन आज इस का जवाब जोसेफ गोएबल्स के रूप में मिलता है.

जोसेफ गोएबल्स नाजी जरमनी का मिनिस्टर औफ प्रोपगंडा था. गोएबल्स का कहना था, 'एक झूठ को अगर बारबार दोहराया जाए तो वह सच बन जाता है और लोग उसी पर यकीन करने लगते हैं.'

बात बिलकुल सही थी, इसलिए पूरे विश्व में हिटलर के राज और गोएबल्स के काज को मानने वाले संकीर्ण लोगों ने इसे तहेदिल से स्वीकार किया. अब गोएबल्स तो नहीं रहा लेकिन उस की कही बातें कइयों के मनमस्तिष्क में घर कर गई हैं और आधुनिक तकनीकी युग में हमारे देश भारत में हर शाख पर गोएबल्स सरीखे खड़े कर दिए गए हैं जिन का काम सिर्फ सरकार या कहें मोदी की चाटुकारिता करना व देशवासियों को गुमराह करना है.

भारत में यह जिम्मा सीधेतौर पर न्यूज चैनलों को भी दे दिया गया है. कहने को चैनल्स जन की आवाज हैं पर उन के असल रिंग मास्टर नरेंद्र मोदी हैं. यही कारण है कि उन के प्रधानमंत्रित्व वाली सरकार के कार्यकाल के दौरान चैनलों के लिए 'गोदी मीडिया' शब्द ईजाद हुआ. इस की कई वजहें हैं.

पिछले साल की बात है, देशवासियों पर कोरोना के बढ़ते कहर का जितना असर पड़ा, उस से कहीं अधिक असर सरकार की बदइंतजामी का पड़ा. अच्छेखासे चलते व्यापार ठप पड़ गए, करोड़ों ने अपनी नौकरियां गंवाईं और शहरों में रहने वाले प्रवासी मजदूर सैकड़ों मील पैदल अपने गांव जाने को मजबूर हुए. किंतु न्यूज चैनलों ने इन समस्याओं पर सरकार से सवाल करने की जगह जनता से दीया, टौर्च जलाने और तालीथाली पीटने के बेवकूफीभरे कृत्य करने पर जोर दिया.

यही नहीं, भाजपाई सरकार के शासन के बीते सालों में नोटबंदी, जीएसटी जैसी आर्थिक (कु)नीतियां थोपी गईं, जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर डाला. हैरानी यह है कि तब भी टीवी चैनल सरकार का बचाव करते दिखे. और अब, जब कृषि कानून जैसी सुसाइडल नीतियां देश पर थोपी जा रही हैं तब भी चैनलों का एक बड़ा धड़ा सरकार की ही गोद में बैठा हुआ है.

इस का हालिया उदाहरण हरियाणा के करनाल में किसानों पर 28 अगस्त को की गई बर्बर लाठीचार्ज की घटना है जिस में एक किसान की मौत और कई किसान बुरी तरह घायल हुए. प्रशासनिक पद पर बैठे अधिकारी किसानों का 'सिर फोड़ने' का सीधा आदेश देते पाए गए. ऐसे आदेश के बाद कई किसानों के सिर फूटे भी, लेकिन मेनस्ट्रीम चैनलों से यह घटना गायब रही.

इस घटना के बाद जब लाखों किसान राजधानी दिल्ली से मात्र 100 किलोमीटर की दूरी पर करनाल सचिवालय में न्याय की गुहार लगाने पहुंचे, तब भी चैनलों के कानों में जूं न रेंगी. चैनलों पर पूरे समय तालिबान-पाकिस्तान ही छाया रहा. यह भारतीय न्यूज चैनलों का षड्यंत्र ही था कि न तो उन्होंने किसानों पर हुए लाठीचार्ज को कवर किया, न ही किसानों की उस दौरान ऐतिहासिक जीत या कहें कि 7 सालों में जनता की तरफ से भाजपा सरकार की पहली हार को जगह दी.

टीवी चैनलों का इसी तरह का फर्जीवाड़ा 20 सितंबर को अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और निरंजनी अखाड़ा के सचिव महंत नरेंद्र गिरि की आत्महत्या मामले को ले कर दिखा. एक मामूली सी आत्महत्या की घटना को पूरे देश में जानबूझ कर नैशनल मुद्दा बना कर तिल का ताड़ बनाया गया. इस मुद्दे का ताल्लुक न तो भुखमरी से मर रहे मजदूरों से था, न किसानों की हर वर्ष होने वाली आत्महत्या से था और न ही बेरोजगारों की फटेहाल जिंदगी से, लेकिन चूंकि लोगों को षड्यंत्र के तहत फालतू मुद्दों से भटकाना था तो यही चलाया गया.

हाल की इन दोनों घटनाओं के विश्लेषण से आसानी से समझा जा सकता है कि आज टीवी चैनल सूचनाओं के मामले में किस गिरावट से गुजर रहे हैं. इस से यह साफ हो जाता है कि ज्यादातर न्यूज चैनल सरकारी चाटुकारिता में लगे हैं. हालांकि, इन के द्वारा किया जा रहा यह कृत्य लोकतंत्र की कब्र खोद रहा है. सरिता टीम ने इन दोनों इवैंट्स पर टीवी न्यूज चैनलों की प्राइम टाइम कवरेज का विश्लेषण किया, जो इस तरह है-

इंडिया टीवी

• 9 सितंबर : रात 8 बजे 'हकीकत क्या है' के तहत सब से पहले 13वीं ब्रिक्स समिट की बात की गई. फिर बाराबंकी यूपी में असदुद्दीन ओवैसी की रैली, ओवैसी का मुख्य एजेंडा, 'यूपी में मुसलमानों का नेता क्यों नहीं है,' सीएम की दावेदारी, गणेश चतुर्थी के नाम पर लोगों के धार्मिक उन्माद इत्यादि दिखाया गया.

रात 9 बजे 'आज की बात रजत शर्मा के साथ' के प्राइम टाइम में पाकिस्तान से 40 किलोमीटर दूर कैसे जैगुआर और हरक्यूलिस विमान उतारे गए, नितिन गडकरी का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू, पाकिस्तान के बाजार में अमेरिकी हथियार की खुलेआम बिक्री, प्रियंका गांधी के यूपी और राहुल गांधी का वैष्णो देवी के दरबार में जाने के समाचार को बताया गया.

• 21 सितंबर : प्राइम टाइम में रात 8 से 10 बजे के बीच एक घंटे से भी ज्यादा समय की कवरेज दी गई वह था महंत महेंद्र गिरि की मौत. रात 8 से 8: 30 बजे तक महंत की आत्महत्या और सुसाइड नोट पर जम कर जांचपड़ताल हुई. फिर करीब 20 मिनट का समय मोदी के अमेरिका भ्रमण पर केंद्रित रखा गया.

रात 9 बजे "आज की बात रजत शर्मा के साथ" की शुरुआत हुई. इस में भी कैमरों का फोकस महंत महेंद्र गिरि के मठ के आसपास, उस के चेलों और सहयोगियों के चेहरों पर और सुसाइड नोट के पन्नों पर घूमने लगा. रजत शर्मा के इस एक घंटे के प्रोग्राम में करीब 45 मिनट का समय महंत की आत्महत्या को दिया गया.

• आजतक

• 9 सितंबर : रात 8-10 बजे के बीच दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों में फोकस भाजपा सरकार का इंटरनैशनल प्रोपगंडा, गणपति के नाम पर धर्म का वही पुराना तमाशा, आतंकवाद और तालिबान के नाम पर मिसलीडिंग रिपोर्ट, फिल्मी नौटंकी, क्रिकेट का फर्जी गुणगान, गैरजरूरी पब्लिसिटी इत्यादि पर ही केंद्रित था.

• 21 सितंबर : रात 8-10 बजे का पूरा प्राइम टाइम बाबा की मर्डर मिस्ट्री को समर्पित कर दिया, वहीं देश की जरूरी खबरों को सिर्फ 5-7 मिनट की हैडलाइन तक ही सीमित रखा.

टीवी 9 भारतवर्ष

• 9 सितंबर : रात के 8 बजे पड़ोसी देश अफगानिस्तान में तालिबान के मुद्दे पर खास कार्यक्रम दिखाया गया. यह आधा घंटे का प्रोग्राम था. रात के 8.30 बजे सुपर प्राइम टाइम कार्यक्रम था, जिस में आधे घंटे में कैसे फरार हुए 6 फिलिस्तीनी कैदी' पर फोकस था. तालिबान पर 100 फटाफट खबरें दिखाई गईं, जिन का देश की समस्याओं से कोई लेनादेना न था.

रात के 9 बजे 'फिक्र आप की' कार्यक्रम में 'पाकिस्तान की शामत आई,' भारत की सामरिक ताकत में इजाफा, सड़क पर फाइटर जहाज की लैंडिंग, जिस में हाईवे पर फाइटर जहाज की लैंडिंग को दिखाया गया.

• 21 सितंबर : रात 8-10 बजे के बीच चैनल में महंत नरेंद्र गिरि की मौत पर फोकस, 13 पन्नों के सुसाइड नोट को बारीकी से पढ़ा गया, महंत आनंद गिरि के बारे में उन की 'कर्मकुंडली,' जमीन विवाद को नया रंग दिया गया, पूरी संपत्ति का ब्योरा दिया गया, महंत नरेंद्र गिरि की अरबों की संपत्ति की जानकारी भी दी गई.

न्यूज नैशन

• 9 सितंबर : रात के 8 बजे पड़ोसी देश अफगानिस्तान में तालिबान के मुद्दे पर खास कार्यक्रम दिखाया गया. टेलीविजन कलाकार सिद्धार्थ शुक्ला की मौत पर सवाल उठाए गए. 8.30 बजे 'देश की बहस' कार्यक्रम में कुछ लोगों के पैनल में बहस दिखाई गई. बहस में भारतपाकिस्तान के कुछ बुद्धिजीवियों की आपसी तूतूमैंमैं ही थी. यह कुल एक घंटे की बहस थी, जो समय की बरबादी से ज्यादा कुछ नहीं थी.

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