पौराणिक काल से चले आ रहे मंदिर,मठ और आश्रम में झगड़े
Sarita|October First 2021
नरेंद्र गिरि आत्महत्या मामला कोई नया मामला नहीं है. मंदिर, मठ और आश्रम के झगड़े काफी पहले से चलते आ रहे हैं. बदलाव यह आया है कि पहले ये झगड़े पद श्रेष्ठता के चलते होते थे, अब इन मठों में दानस्वरूप अथाह संपत्ति और धनवर्षा होने से इन का रूप दानपात्र पर नियंत्रण पाने का हो गया है.
शैलेंद्र सिंह

पौराणिक काल से ही मठ, मंदिरों और आश्रमों में झगड़े होते रहे हैं. पहले जमीनजायदाद बहुत मूल्यवान नहीं होती थी तो ये झगड़े प्रतिष्ठा, सम्मान और श्रेष्ठता के लिए होते थे. प्रतिष्ठा, सम्मान और श्रेष्ठता के टकराव में अलगअलग धर्म और संप्रदाय बनते गए. इन के अलगअलग देवता और मंदिर, आश्रम बनते गए.

रामायाण काल की बात करें तो विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच टकराव श्रेष्ठता को ले कर ही था. विश्वामित्र ने ऋषि, महर्षि और राजर्षि तक की उपाधि , पा ली थी लेकिन कोई उन को ब्रह्मर्षि मानने को तैयार नहीं था. ब्रह्मर्षि की उपाधि वशिष्ठ को मिली थी. विश्वामित्र ने वशिष्ठ से वैमनस्य रखना शुरू कर दिया. ऐसे संतों की संख्या कम नहीं है. अपनी श्रेष्ठता को बनाए रखने के कारण ही 33 करोड़ देवता और तमाम धर्मसंप्रदाय बनते गए.

जैसेजैसे मठ, आश्रमों और मंदिरों में धन संपदा बढ़ने लगी, इन के रूप बदलने लगे. मंदिरों में कब्जे और दानपात्र पर नियंत्रण किया जाने लगा. मंदिरों की कमेटियों में झगड़े शुरू हो गए. मंदिर में ही रखे दानपात्र में एक से अधिक ताले लगने लगे. जिस की वजह यह थी कि जब दानपात्र खुले तो हर वह आदमी वहां मौजूद रहे जिस के पास उस की चाबी होती है. ज्यादातर मठ, मंदिर और आश्रम गुरु-शिष्य परंपरा के होते हैं जहां गुरु ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करता है. मठ, मंदिर और आश्रमों पर कब्जा करने के लिए गुरु यानी मंदिर के महंत को अपने पक्ष में करने के लिए शिष्य साम, दाम, दंड, भेद का प्रयोग करने लगे. अगर इस से बात न बने तो बात महंत यानी गुरु की हत्या तक पहुंच जाती है.

प्रयागराज में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और बाघंबरी मठ के महंत नरेंद्र गिरि की मौत के बाद यह बात एक बार फिर से चर्चा में जरूर आ गई है, पर मठ, आश्रम और मंदिरों में जमीनजायदाद और प्रभाव को ले कर झगड़े 90 फीसदी मंदिरों में चल रहे हैं. जिन लोगों ने छोटे महंत कहे जाने वाले आनंद गिरि की लाइफस्टाइल को देखा, वे समझ रहे थे कि छोटे महंत आनंद गिरि और बड़े महंत नरेंद्र गिरि के बीच प्रभाव और श्रेष्ठता को ले कर जो झगड़ा चल रहा है वह कुछ कर गुजरेगा. यह जंग पैसों को ले कर शुरू हुई. इस के बीच की बड़ी वजह आनंद गिरि की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा भी थी.

विवाद की वजह दान के पैसे

2019 के कुंभ का आयोजन जब प्रयागराज में हुआ और भाजपा के बड़े नेताओं और मंत्रियों का वहां आनाजाना हुआ तो अपना रसूख बढ़ाने के लिए आनंद गिरि इन सब से मिलने लगा. यह बात नरेंद्र गिरी के खेमे को पसंद नहीं आ रही थी. आंनद गिरि कई कामों की जानकारी अपने महंत नरेंद्र गिरि को भी नहीं देता था. आपसी खींचतान के बाद यह मामला एकदूसरे को मंदिर से बेदखल करने तक पहुंच गया. मंदिर की जमीन पर पैट्रोल पंप खोलने को ले कर हुए विवाद के बाद नरेंद्र गिरि ने अपने शिष्य आनंद गिरि को मठ और मंदिर से बेदखल कर दिया.

इस के बाद आनंद गिरि अपने ही गुरु पर जायदाद के हेरफेर, परिवार और करीबी लोगों को मंदिर की संपत्ति को देने के साथ ही साथ उन के चरित्रहनन का काम करने वाली बातें कहने लगा. यही वह सब से बड़ा पेंच था जिस के डर से महंत नरेंद्र गिरि ने आत्महत्या कर ली.

मंदिरों में जिस पैसे और जायदाद को ले कर विवाद हो रहा है वह जनता द्वारा दिया गया दान होता है. जनता को यह देखना चाहिए कि वह जो पैसा भगवान के नाम पर मंदिरों में दान देती है उस का असल उपभोग कौन कर रहा है? इस के कारण कितने झगड़े बढ़ रहे हैं? संत और महात्मा भगवान के नाम पर डरा कर जनता से पैसे वसूलते हैं. दान के इन्हीं पैसों पर संतमहात्मा ऐश करते हैं. इस के लिए ही तमाम झगड़े होते हैं. बाघंबरी मठ और निरंजनी अखाड़ा करीब 9 सौ साल पुराने मठ हैं. इन के पास 3 हजार करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति है. यह कई राज्यों में फैली है. मठों का काम शिक्षा देने का होता था.

मठ को राजा या सरकार जमीन और पैसा इसलिए देती थी कि वह शिक्षा के क्षेत्र में इस का प्रयोग कर सके. महंत केवल केयरटेकर की तरह होता है. वह मठ की संपत्ति का मालिक नहीं होता. लेकिन होता इस के ठीक उलटा है. महंत मालिक की तरह से काम करता है. अपने लोगों, नातेरिश्तेदारों को इस का लाभ देता है. मठों में यह नियम होता है कि दीक्षा लेने के बाद अपने परिवार से संबंध त्यागने पड़ते हैं.

आज 90 फीसदी मठ के महंत अपने परिवार के लोगों के साथ संबंध रखते हैं. नरेंद्र गिरि ने जब अपने शिष्य आनंद गिरि को मठ से निकाला तो आरोप यही था कि वह अपने परिवारजनों को इस का लाभ देता है. यही आरोप बाद में आनंद गिरि ने अपने महंत नरेंद्र गिरि पर भी लगाया था. लोक कल्याण के नाम पर बनने वाले मठ संतों के लिए पैसे पैदा करने वाली मशीनें बन गए हैं.

नरेंद्र गिरि के प्रभाव में रही सत्ता और सरकार

साल 1984 नरेंद्र सिंह की मुलाकात संगम किनारे बने निरंजनी अखाड़े के संत कोठारी दिव्यानंद गिरि से होती है. नरेंद्र सिंह उन की सेवा करने लगते हैं. वे अपने घर वापस जाने को राजी नहीं हुए तो तब दिव्यानंद नरेंद्र को ले कर हरिद्वार चले गए. वहां उन का समर्पण भाव देख कर दिव्यानंद ने 1985 में उसे संन्यास की दीक्षा दी और उस का नामकरण नरेंद्र गिरि के रूप में कर दिया.

Continue reading your story on the app

Continue reading your story in the magazine

MORE STORIES FROM SARITAView All

पुरातनी अहंकार पर किसान विजयी

अगर उलटा हुआ होता यानी किसानों ने अपना आंदोलन वापस ले लिया होता तो तय है उठाने वाले देश सिर पर उठा लेते, जगहजगह पटाखे फोड़े जा रहे होते, , गुलालअबीर उड़ रही होती, मिठाइयां बांटी जा रही होतीं, जुलूस निकल रहे होते, जश्न मन रहे होते और कहा यह जाता कि देखो, मोदी की एक और जीत, फर्जी किसान मुंह छिपा कर भाग गए, राष्ट्रद्रोही ताकतों ने घुटने टेक दिए और देश एक बार फिर टूटने से बच गया.

1 min read
Sarita
December First 2021

रक्ष

रक्ष एक कपड़े को कस कर दबोचे सो रहा था. इसे देख राघव की आंखों में आंसू आ गए और एक क्षणभंगुर विचार उस के दिमाग में कौंध गया कि रक्ष क्या उस के पिता की गंजी पकड़ कर सो रहा है या उन का असीमित स्नेह रक्ष को पकड़े है. आखिर रक्ष का बाबूजी से रिश्ता कैसा था.

1 min read
Sarita
December First 2021

एमिल की सोफी

महिला की वैज्ञानिक चेतना को अवरुद्ध कर पुरुष समाज उसे एमिल की सोफी बनाए रखना चाहता है. इसी अवधारणा को धर्म भी किसी न किसी माध्यम से बड़ी ही चालाकी से साकार करता आ रहा है.

1 min read
Sarita
December First 2021

धूमावती

36 साल की आयु में 25 साल की लगने वाली हेमा को देख ब्रांच मैनेजर प्रभास की आंखों की चमक देखते ही बनती थी. दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हो चुके थे. हेमा की सीधेसादे पति तरुण में अब जरा भी दिलचस्पी नहीं थी. क्या प्रभास पत्नी मेघना के हाथों में बंधी डोर तोड़ सका.

1 min read
Sarita
December First 2021

महिला विमर्श हिंदू धर्म, आरएसएस और कांग्रेस

कांग्रेस महिला विमर्श के मसले पर सच में संवेदनशील दिखाई दे रही है या चुनावी जमीन तैयार कर रही है, यह बाद में पता चलेगा, पर उत्तर प्रदेश में महिलाओं को 40 प्रतिशत सीटें देने और महिला कांग्रेस दिवस पर राहुल गांधी का महिलाओं के नाम आरएसएस पर बेबाक बयान, बहुतकुछ इशारा करता है.

1 min read
Sarita
December First 2021

कमर्शियल गैस के बढ़ते दाम ताबे और मजदूरों पर महंगाई की मार

'बहुत हुई महंगाई की मार, अब की बार...' यह नारा याद है न. यह नारा आज लोगों की मुसीबत बन गया है. हर चीज के दाम बढ़े हैं, नई मार कमर्शियल गैस पर पड़ी है. क्या आप जानते हैं कमर्शियल गैस के दाम बढ़ने से किन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है?

1 min read
Sarita
December First 2021

खिलौने बदल दें लड़कियां बदल जाएंगी

बेटियों को घिसेपिटे खिलौने मिलेंगे तो वे हमेशा दब्बू बनी रहेंगी. आत्मविश्वासी और साहसी बनाने के लिए 6 महीने बाद ही कौन से सही खिलौने दें, जानें.

1 min read
Sarita
December First 2021

अमीरों से रिश्ते कैसे निभाएं

अमीरी और गरीबी समाज का सत्य है. समाज को छोड़िए, परिवार के भीतर तक में यह अंतर होता है. एक की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है तो दूसरे की बेहद खराब होती है. दोस्तों में भी ऐसा संभव है.

1 min read
Sarita
December First 2021

अंधकार मन से दूर केरो

मुझे रातें पसंद हैं पर, ऐसा नहीं कि अंधेरा मेरी जिंदगी का हिस्सा हो...

1 min read
Sarita
December First 2021

5 साल से रिस रहा है नोटबंदी का घाव

नोटबंदी हुए 5 साल बीत चुके हैं. 50 दिन का समय मांगते प्रधानमंत्री मोदी को जनता ने 5 साल दे दिए, पर आज भी सभी के दिमाग में कई सवाल घूम रहे हैं कि आखिरकार नोटबंदी से क्या फायदा हुआ? क्या कालाधन आया? क्या आतंकवाद व नक्सलवाद खत्म हुआ? क्या देश की अर्थव्यवस्था बढ़ी? अगर नहीं, तो यह जनता पर क्यों थोपी गई?

1 min read
Sarita
December First 2021